ओआईसी: पाकिस्तान से ऐसे मुस्लिम मंच छीन ले गया भारत

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न्यूज चक्र @ सेन्ट्रल डेस्क
भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पहली बार शुक्रवार (1मार्च) को मुस्लिम बहुल देशों के संगठन ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) की बैठक में बतौर ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ शामिल हुईं। ओआईसी में भारत की मौजूदगी कूटनीतिक लिहाज से इसलिए भी अहम है, क्योंकि पाकिस्तान लगातार भारत को संगठन से बाहर रखने का दबाव बना रहा था।
चार महाद्वीपों के 57 देशों वाला यह संगठन करीब 1.5 अरब की आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्य देशों की कुल जीडीपी करीब 7 ट्रिलियन डॉलर है। ओआईसी संयुक्त राष्ट्र के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटर गवर्नमेंटल ग्रुप है।
यह संगठन खुद की पहचान मुस्लिम दुनिया की सामूहिक आवाज के तौर पर करता है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन इसके बावजूद भारत ना तो ओआईसी का सदस्य है और ना ही इसे पर्यवेक्षक का दर्जा मिला है। भारत में भले ही मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, लेकिन कई इस्लामिक देशों की तुलना में भारत में मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है।
भारत में 18.3 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जबकि पाकिस्तान में मुस्लिमों की आबादी 19.5 करोड़ और इंडोनेशिया में 22.2 करोड़ है। ओआईसी में भारत की दावेदारी का ये एक मजबूत आधार भी है।
वहीं, भारत को इस बैठक में आमंत्रित किए जाने के कारण पाकिस्तान ने इसका बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने इस सम्बन्ध में अपनी संसद में कहा था, “वर्तमान परिस्थितियां देखते हुए मेरे लिए यह सम्भव नहीं है कि जिस बैठक में सुषमा स्वराज को बुलाया गया हो, वहां मैं जाऊं।” पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियां भी ओआईसी बैठक का बहिष्कार करने की मांग कर रही थीं। यहां खास बात यह है कि पाकिस्तान ओआईसी के फाउंडर मेम्बर्स में शामिल है।
ओआईसी में कई गैर-मुस्लिम देशों को भी पर्यवेक्षकों का दर्जा मिल चुका है। 2005 में रूस को संगठन में पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल कर लिया गया था, जबकि यहां मुस्लिम आबादी केवल 2.5 करोड़ ही है। बौद्ध बहुल देश थाईलैंड को भी ये दर्जा 1998 में मिल चुका है। विडम्बना ये है कि सितम्बर 1969 को राबात में हुई पहली इस्लामिक कॉन्फ्रेंस का हिस्सा भारत था, जिसमें ओआईसी का जन्म हुआ था। सऊदी अरब के राजा फैसल भारत को संगठन का न्योता देना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तान ने दबाव बनाते हुए भारत को संगठन से बाहर कर दिया। पाकिस्तान 1990 के बाद से ही इस संगठन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने में लगा रहा है। वहीं इस बीच भारत ने ना केवल ओआईसी के सदस्य देश यूएई से नजदीकियां बढ़ाईं, बल्कि पूरी दुनिया के मुस्लिम देशों के साथ भारत के रिश्ते मजबूत हुए।
यूएई ने महसूस किया कि भारत की वैश्विक स्थिति और मुस्लिम आबादी का सम्मान किया जाना चाहिए। इसका समर्थन तुर्की ने भी किया और कहा कि भारत की ओआईसी में ज्यादा बड़ी भूमिका होनी चाहिए।
यूएई सरकार ने भारत को ओआईसी बैठक में आमंत्रित करते हुए कहा, दोस्ताना रवैये वाले देश भारत को मजबूत वैश्विक स्थिति, ऐतिहासिक विरासत और इसके मुस्लिम आबादी को देखते हुए ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ के तौर पर बुलाया गया।
ओआईसी की 2018 में ढाका में हुई बैठक में बदलाव की जमीन तैयार होने लगी थी। बांग्लादेश ने तुर्की के साथ मिलकर 57 देशों के संगठन में सुधार लाने की मांग की थी। बैठक में बांग्लादेश ने तुर्की को अपने साथ लाने में कामयाबी पाई थी।
तुर्की का पक्ष थोड़ा दिलचस्प है। पाकिस्तान के साथ इस देश के शुरुआत से ही अच्छे रिश्ते रहे हैं, लेकिन हाल के कुछ वर्षों में तुर्की और भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी दोनों ही मजबूत हुई है।
ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक को सम्बोधित करते हुए बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश मंत्री एएच महमूद अली ने कहा था, कई ऐसे देश हैं जहां मुस्लिमों की आबादी काफी ज्यादा है, फिर भी वे ओआईसी के सदस्य नहीं हैं। मुस्लिम भले ही इऩ देशों में अल्पसंख्यक हों, लेकिन संख्या के लिहाज से कुछ देश ओआईसी के सदस्य देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा है।
भारत की एंट्री की वाकलत करते हुए बांग्लादेशी विदेश मंत्री ने कहा था, “गैर ओआईसी देशों के साथ भी तालमेल की जरूरत है, ताकि दुनिया की एक बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी संगठन के अच्छे कामों से वंचित ना रह पाए। ओआईसी में सुधारों की सख्त जरूरत है।”
बांग्लादेश के भारत के ओआईसी में पर्यवेक्षक दर्जा देने के लिए बांग्लादेश की वकालत के साथ-साथ कई अन्य देशों ने भी अपना समर्थन दिया। वहीं, कुछ देश खुलकर भले ही भारत के समर्थन में ना आ रहे हों, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत को पर्यवेक्षक का दर्जा देने के लिए 1960 में रहीं स्थितियां काफी बदल चुकी हैं।
दुनिया के सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश इंडोनेशिया ने भी ओआईसी की बैठक में कश्मीर के मुद्दे पर भारत का विरोध करने वाले बयान का विरोध किया था।
ओआईसी के अन्य सदस्य देशों मोरक्को, ट्यूनीशिया और मिस्त्र में भारत ने अपनी पहुंच मजबूत की है। भारत ने ओआईसी के सदस्य पश्चिमी एशियाई देशों के साथ भी अपने सम्बन्ध प्रगाढ़ बनाए रखे हैं। अमेरिका के दबाव के बावजूद भी भारत ने ईरान के साथ अपनी साझेदारी बनाए रखी है। खाड़ी देशों और जॉर्डन, ईराक के साथ यूएई के साथ रणनीतिक साझेदारी ने भी दिल्ली की ओआईसी में पहुंच बनाने में मदद की है।