1984 सिख दंगा: कांग्रेस के बड़े नेता सज्जन कुमार को अंतिम सांस तक जेल की सजा

0
105

न्यूज चक्र @ नई दिल्ली
1984 सिख विरोधी दंगे के दिल्ली कैैंट मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कांग्रेस के एक बड़े नेता सज्जन कुमार को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। सज्जन कुमार ताउम्र जेल में रहेगा। उसे सरेंडर करने के लिए 31 दिसम्बर तक का समय दिया है। इस मामले में बड़ी बात यह है कि निचली अदालत ने सज्जन कुमार को बरी कर दिया था। कांग्रेस के पूर्व पार्षद बलवान खोखर व रिटायर्ड नौसेना अधिकारी भागमल सहित तीन अन्य को हाईकोर्ट ने दोषी बरकरार रखा है।
हाईकोर्ट की कांग्रेस के खिलाफ कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए कहा, ‘यह आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी हिंसा थी। इस दौरान पूरा तंत्र फेल हो गया था। यह हिंसा राजनीतिक फायदे के लिए करवाई गई थी। सज्जन कुमार ने दंगा भड़काया था।’ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा, ‘विभाजन के समय 1947 के गर्मी के दौरान बहुत सारे लोगों का कत्लेआम किया गया और इसके 37 साल बाद दिल्ली भी इसी तरह की त्रासदी की गवाह बनी। आरोपी ने अपने राजनीतिक संरक्षण का लाभ लिया और निचली अदालत से बचता रहा।’ हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सिख दंगे की भयावहता और दुखद मंजर को बताने के लिए काफी है।
कोर्ट ने कहा कि साल 1984 में नवम्बर महीने की शुरुआत में दिल्ली में अाधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2,733 और पूरे भारत में लगभग 3,350 लोगों की बेरहमी से हत्या की गई। इतने लोगों की सामूहिक हत्या की ये पहली वारदात नहीं थी। अफसोस है कि ये आखिरी भी नहीं थी। भारत विभाजन के समय पंजाब, दिल्ली और कई अन्य जगहों पर सामूहिक हत्याएं हुई थीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ये निर्दोष सिखों की हत्या की तरह ही बेहद तकलीफदेह यादें हैं, जो कि हमारे जेहन में अभी तक मौजूद हैं। सिख दंगा की ही तरह 1993 में मुम्बई में, साल 2002 में गुजरात में, साल 2008 में ओडिशा के कंघमाल में व साल 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में घटनाएं हुईं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्रकै़द की सज़ा देते हुए कहा कि मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार हमारे घरेलू क़ानून का हिस्सा नहीं हैं। इन कमियों को ख़त्म करने की जल्द से जल्द ज़रूरत है।
इसलिए भड़के थे सिख विरोधी दंगे
उल्लेखनीय है कि सज्जन कुमार को जिस मामले में सजा हुई है वह 1984 के सिख दंगों में पांच लोगों की मौत से जुड़ा हुआ है। दिल्ली कैंट इलाके के राजपुर में एक नवम्बर 1984 को हज़ारों लोगों की भीड़ ने सिख समुदाय के लोगों पर हमला कर दिया था, जिसमें एक परिवार के तीन भाइयों नरेन्द्र पाल सिंह, कुलदीप और राघवेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई, जबकि एक दूसरे परिवार के गुरप्रीत और उनके बेटे केहर सिंह भी मारे गए थे। कांग्रेस की सरकार होने से दबाव के चलते दिल्ली पुलिस ने वर्ष 1994 में ये केस बंद कर दिया। लेकिन 1998 में आई अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने नानावटी जांच आयोग गठित किया। इसकी रिपोर्ट के आधार पर साल 2005 में इस मामले में केस दर्ज किया गया। मई 2013 में निचली अदालत ने इस मामलें में पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर, नौसेना के रिटायर्ड अधिकारी कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और दो अन्य लोगों को दोषी करार दिया, लेकिन कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
इसके बाद पीड़ित पक्ष और दोषियों ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। इसी वर्ष 29 अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। सज्जन कुमार के खिलाफ 1984 सिख दंगों से जुड़े कुल पांच मामले चल रहे हैं, जिनकी जांच 2014 में गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) कर रही है। इस एसआईटी का गठन वर्तमान मोदी सरकार ने किया था। इसी के बाद इसकी जांच में तेजी आई।
उल्लेखनीय है कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्हीं के‌ दो सिख अंगरक्षकों ने अंधाधुंध गोलियां बरसा कर हत्या कर दी थी। इसके बाद देशभर में कांग्रेस नेताओं व समर्थकों ने सिखों का नरसंहार व उनकी महिलाओं से ज्यादती की। तीन दिन तक दिल्ली सहित देशभर में यह शैतानी खेल चला। इसमें आरोपियों के रूप कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के नाम सामने आए।‍ इनमें सज्जन कुमार, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर, एमपी के सीएम‌ बने कमलनाथ जैसे‌ दिग्गज शामिल रहे। मगर राजनैतिक संरक्षण के चलते इन्हें सजा की बात तो अलग इनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई।‌ जिनके खिलाफ केस‌ दर्ज भी हूआ तो ट्रायल नहीं हो सका था। उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही अब बाकी आरोपियों को भी अपने पाप की सजा मिल सकेगी।