भाजपा को तगड़ा झटका देने के बावजूद कांग्रेस के लिए राहत की खबर नहीं

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-राजीव सक्सेना
राजस्थान में कांग्रेस पांच साल के अंतराल के बाद फिर सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत के आंकड़े को छू चुकी है, मगर यह उसके लिए राहत की बात बिलकुल नहीं है। इसके उलट उसे गिरते-पड़ते इस स्तर तक पहुंचने पर भारी चिंता होनी चाहिए। वो भी ऐसी स्थिति में जबकि राज्य की जनता में व्यक्तिगत रूप से सीएम वसुंधरा राजे के प्रति कुछ महीने पहले तक भारी नाराजगी थी। मतदान के समय भी कई बड़े मसलों को लेकर तगड़ी सत्ता विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) थी।
दूसरी ओर मास्टर स्ट्रोक माने जा रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लेकर यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ, स्मृति इरानी,शाहनवाज खान, मुख्तार अब्बास नकवी आदि के दौरे भी राज्य में भाजपा के लिए जीवनदायिनी साबित नहीं हो सके। यह इस पार्टी लिए तगड़ा झटका है। सीएम वसुंधरा की कई प्रभावी योजनाएं, अभियान, गौरव यात्राएं सब धरी रह गईं। जाति-धर्म, गौत्र, पाकिस्तान परस्ती, भगवान की जाति, असली देशभक्त, देशद्रोही, विकास की राजनीति जैसे मुद्दे सबने अपने-अपने तरीके से खूब उछाले। रफायल उड़ा, चौकीदार को चोर कहा, जीजा जी भी बीच में आए, मगर ये सब मिला कर भी किसी भी पक्ष को यथोचित स्थान नहीं दिला पाए। 130-150 सीटें तक हासिल करने का दावा कर रही कांग्रेस रेंगते हुए बहुमत के अंक 100 पर पहुंची। गत बार उसे मात्र 21 सीटें मिलीं थीं। भाजपा को 163 से नीचे उतार कर 30-40 तक समेट देने का दम्भ था, मगर वह आराम से 73 पर जा अटकी।
भाजपा को इसलिए हुआ नुकसान
सीएम वसुंधरा राजे अपने कार्यकाल के आधे से अधिक समय तक तो जनता की समस्याओं से लगभग दूर रहीं। अपनी मनमानी करती रहीं। उनके कथित अकड़ालू स्वभाव की काफी चर्चा रही। आम कार्यकर्ता से लेकर पार्टी विधायकों व कई मंत्रियों तक में इससे उनके खिलाफ असंतोष पनपा। यह अलग बात है कि विधायक-मंत्री इसे खुलकर जाहिर नहीं कर सके। जनता के बीच यह बात गई। इसने सरकार के खिलाफ इमेज बनाई, जो अंत तक कायम रही। यह आम चर्चा थी कि वे अपने मंत्रियों तक से सम्मानजनक व्यवहार नहीं करती हैं। हालांकि इस बीच उनका स्वभाव बदला नजर आने लगा था। आखिर के दो-सवा दो साल जब बाकी रहे, तब जाकर वसुंधरा राजे तेजी से सक्रिय हुईं। धड़ाधड़ विभिन्न योजनाएं लागू की गईं। कुछ पेचीदगियों के बावजूद योजनाएं आमजन के लिए काफी लाभकारी रहीं। मगर ये लाभ उन तक पहुंचते-पहुंचते काफी देर हो गई थी, यूं भी कहा जा सकता है कि देरी की वजह से ये लाभ लक्षित वर्गों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाए। नौकरशाहों व नेताओं को बचाने के लिए उनके द्वारा गुपचुप तरीके से लागू कर दिया गया अध्यादेश व बाद में इसे बिल के रूप में पारित कराने की असफल कवायद ने भी वसुंधरा के खिलाफ तगड़ा जनाक्रोश पैदा कर दिया था। इसमें मीडिया तक पर पाबंदी का प्रावधान था। वसुंधरा राजे ने पहले अशोक परनामी तो बाद में मदल लाल सैनी को ही जिद पर अड़ प्रदेशाध्यक्ष बनवाया। इस बीच पार्टी में लम्बे समय तक चली खींचतान, अंत में उनके सामने हाईकमान तक के झुकने की खबरों से भी वसुंधरा के खिलाफ कार्यकर्ताओं में ही नहीं आमजन तक में नाराजगी पैदा हो गई थी।
प्रचार के दौरान बेशक वसुंधरा ने गत कांग्रेस सरकार से तुलना करते हुए अपने कार्यकाल की जो उपलब्धियों बताईं, उनका कांग्रस जवाब तक नहीं दे सकी। मतलब यह है कि उनके कार्यकाल में विकास कार्य तो काफी हुए। अपनी सभाओं के दौरान वसुंधरा ने कांग्रेस को अपने दावों को गलत साबित करने की चुनौती दी, मगर कांग्रेस उनका जवाब नहीं दे सकी। उन्होंने हर जगह आंकड़ों के साथ अपने कार्य गिनाए। इसके बावजूद भी वे सत्ता में वापसी तो नहीं कर पाईं, मगर शर्मनाक हार से बच गईं। इधर, हनुमान बेनीवाल की पार्टी हालांकि दो सीट ही हासिल कर पाई है, मगर उसने भाजपा को कई सीटों पर हरा दिया। टिकट वितरण में रही खामी भी भारी पड़ी। मुस्लिम प्रत्याशियों की पूरी तरह अनदेखी भी नुकसान दायक रही। उस पर केन्द्र सरकार द्वारा एससी-एसटी एक्ट में परिवर्तन करना, भाजपा को राजस्थान में भी झटका दे गया।
स्टार प्रचारकों का ऐसा रहा रोल
पीएम मोदी व अमित शाह सहित अन्य स्टार प्रचारकों ने राज्य में सभाएं कर राष्ट्रीय मुद्दे उठाए। राहुल व कांग्रेस पर अपने आरोप जमकर दोहराए, उन पर चुटकियां लीं। यूपी के सीएम योगी तो बेवजह हनुमान को दलित बता कर बड़ा विवाद खड़ा कर गए। नतीजों से नहीं लगता कि राजस्थान की जनता को इस बार इन बातों ने खास प्रभावित किया। इसके उलट जिस तरह वसुंधरा राजे अपने भाषणों में उनके कार्यकाल में हुए विकास कार्याें को आंकड़ों के साथ गिनाती थीं, उसी तरह से राष्ट्रीय नेता भी करते तो सम्भवतया भाजपा को अधिक फायदा होता।
मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अमित शाह भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष हैं। मगर इन दोनों के भाषणों की शैली से भी अब जनता उकताने लगी है। मोदी को चाहिए कि वे जिस तरह से विदेशों में संयमित हावभाव से भाषण देते हैं, देश में भी थोड़ा सा वैसा ही पुट शामिल करें, जो शालीन लगे, उनके पद व स्तर के अनुरूप हो। इससे जनता वापस उनसे जुड़ने लगेगी।
कांग्रेस का अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन इसलिए नहीं रहा
राज्य में हालांकि प्राकृतिक आपदा तथा फसलों की अधिक पैदावार से किसानों को बहुत नुकसान हो रहा था। मगर सरकार उन्हें ठीक से राहत नहीं दे पा रही थी। अच्छी योजनाओं का लाभ भी उसे नहीं मिल पा रहा था। यहां तक कि अभी तो यूरिया की किल्लत ही बड़ा मुद्दा था। बजरी की किल्लत हालांकि अदालत की पाबंदी की वजह से थी, मगर इससे हजारों परिवार सीधे तौर पर बेरोजगारी की मार झेल रहे थे। हजारों अन्य लोग अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे थे। कुल मिलाकर सरकार के खिलाफ रोष था। इसके बावजूद कांग्रेस ने टिकट वितरण में भारी खामियां रख, इससे पैदा हुए विवादों से राज्य की जनता की मनोस्थिति को उलटी दिशा में प्रभावित किया। यह कांग्रेस के खिलाफ गया। दिल्ली तक से इस सम्बन्ध में ऐसी खबरें आईं, जिन्होंने कांग्रेस के पक्ष में बने हुए माहौल को कमजोर किया। फिर अशोक गहलोत, सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही जंग भी इसका हिस्सा रही।
चाहे कांग्रेस की राज्य में सरकार बन रही है। इसके लिए राहुल गांधी के नेतृत्व को ही कारण माना जा रहा है, मगर वास्तव में ऐसा है नहीं। उप चुनावों में कांग्रेस को मिली जीत का कारण राहुल गांधी नहीं होकर जनता की वसुंधरा सरकार के प्रति नाराजगी थी या सचिन पायलट और अशोक गहलोत का प्रभाव। ऐसा ही इन चुनावों में भी हुआ। कांग्रेस को वोट देने वाले आम मतदाता से यह बात जानी जा सकती है। उसे राहुल की रफायल की जुगलबंदी समझ नहीं आई, कोट के उपर जनेऊ डाल कर घूमने से भी उनका मजाक बना। राहुल के अन्य हावभावों से भी आम मतदाता अधिक प्रभावित नहीं है। उसे तो सीधा सचिन पायलट या अशोक गहलोत ही प्रभावित करते हैं। कांग्रेस के पास अन्य कोई दमदार स्टार प्रचारक नहीं है।
कांग्रेस के खिलाफ ये वीडियो भी गए
सबसे पहले मध्य प्रदेश के कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष एवं सीएम के दावेदार कमलनाथ एक वीडियो में केवल मुस्लिम मतों की ही चिंता करते दिखाई दिए। इसके बाद राजस्थान के दिग्गज सीपी जोशी ब्राह्मणों के अलावा किसी अन्य को हिन्दू धर्म पर बोलने लायक नहीं होने का ज्ञान देते एक वीडियो में नजर आए। यह विवाद थमा नहीं था कि बीकानेर से प्रत्याशी बीडी कल्ला का भी एक विवादित वीडियो सामने आ गया। इसमें वे भारत माता की जय बोलते कार्यकर्ता का मुंह दबा कर रोकते नजर आए। इसके बाद उस कार्यकर्ता से कल्ला कुछ कहते हैं तो वह जोर-जोर से सोनिया गांधी की जय के नारे लगाने लग जाता है। रामगढ़ से प्रत्याशी साफिया खान वीडियो में कार्यकर्ताओं से कहती नजर आईं कि साम-दाम-दंड-भेद कैसे भी वोट लो, इसके लिए चाहे सिर फोड़ना पड़ जाए। यह सब भी कांग्रेस के खिलाफ गया।
सबसे बड़ी बात, जो जनता पूछ रही है
अब एक ऐसी बात जो राजस्थान की जनता कांग्रेस से पूछ रही है। अरे भई, हमने तो शुरू से ही कह दिया था कि वसुंधरा तेरी खैर नहीं। मतलब ये जीत तो हमारी ही दी हुई है। इससे अधिक सीटें बढ़ती तब तो आपकी मेहनत या आपका प्रभाव मानते। यह परिणाम तो उलटा आपको यह सबक है कि आप जनता की पसंद नहीं, मजबूरी हो।