राम मंदिर विवाद पर सुनवाई का रास्ता साफ, बड़ी बेंच में नहीं जाएगा मस्जिद में नमाज़ का मामला

0
255

न्यूज चक्र @ नई दिल्ली
अयोध्या रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े 1994 के इस्माइल फारूकी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 2-1 के फैसले के हिसाब से कहा है कि अब ये फैसला बड़ी बेंच को नहीं भेजा जाएगा। इस केस के पक्षकारों ने इसे सात सदस्यीय बेंच में ट्रांसफर करने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि इस्माइल फारूकी केस से अयोध्या जमीन विवाद का मामला प्रभावित नहीं होगा, ये केस बिल्कुल अलग है। इस फैसले से अयोध्या केस में सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। अब 29 अक्टूबर 2018 से अयोध्या टाइटल सूट पर सुनवाई शुरू होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले के जल्‍द निस्‍‍‍‍‍‍‍तारण पर जोर दिया जाएगा। कोर्ट ने अयोध्‍या मामले को धार्मिक मानने से इनकार किया है। कोर्ट ने कहा है कि इस मामले की सुनवाई प्रॉपर्टी डिस्‍प्‍यूट (जमीन विवाद ) के तौर पर होगी। फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण व जस्टिस नजीर शामिल थे।
बाकी दो जजों के फैसले से जस्टिस नजीर ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि वह साथी जजों की बात से सहमत नहीं हैं। यानी इस मामले पर फैसला 2-1 के हिसाब से आया है। जस्टिस नजीर ने कहा कि जो 2010 में इलाहाबाद कोर्ट का फैसला आया था, वह 1994 फैसले के प्रभाव में ही आया था। इसका मतलब इस मामले को बड़ी पीठ में ही जाना चाहिए था।
जस्टिस अशोक भूषण ने अपना फैसला पढ़ते हुए कहा कि हर फैसला अलग हालात में होता है। पिछले फैसले के संदर्भ को समझना जरूरी है। जस्टिस भूषण ने कहा कि पिछले फैसले में मस्जिद में नमाज अदा करना इस्लाम का अंतरिम हिस्सा नहीं है, कहा गया था, लेकिन इससे एक अगला वाक्य भी जुड़ा है।
जस्टिस भूषण ने अपने और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की तरफ से कहा कि इस मामले को बड़ी बेंच को भेजने की जरूरत नहीं है। जो 1994 का फैसला था, हमें उसे समझने की जरूरत है। पिछला फैसला सिर्फ जमीन अधिग्रहण के हिसाब से दिया गया था।
फैसला पढ़ते हुए जस्टिस भूषण ने आगे कहा कि- ‘सभी मस्जिद, चर्च और मंदिर एक समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। राज्यों को इन धार्मिक स्थलों का अधिग्रहण करने का अधिकार है। लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि इससे सम्बन्धित धर्म के लोगों को अपने धर्म के मुताबिक आचरण करने से वंचित किया जाए।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दलील दी गई थी कि इस पर जल्दी निर्णय लिया जाए। कोर्ट को बताना था कि यह मामला संविधान पीठ को रेफर किया जाएगा या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को इस मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया था कि संविधान पीठ के इस्माइल फारूकी (1994) फैसले को बड़ी बेंच को भेजने की जरूरत है या नहीं।
कोर्ट ने पहले यह दिया था फैसला
1994 में इस्माइल फारूकी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने फैसला दिया था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। इसके साथ ही राम जन्मभूमि में यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया गया था, ताकि हिन्दू धर्म के लोग वहां पूजा कर सकें। मुस्लिम पक्षकारों का कहना था कि इस फैसले पर दुबारा परीक्षण किए जाने की जरूरत है।
2010 में आया था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
उल्लेखनीय है कि 30 सितम्बर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यह फैसला सुनाया था कि विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जाए। एक हिस्सा रामलला के लिए, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा हिस्सा मुसलमानों को दिया जाए। 30 सितम्बर 2010 को जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एसयू खान और जस्टिस डीवी शर्मा की बेंच ने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था।
आदेश में बेंच ने 2.77 एकड़ की विवादित भूमि के तीन बराबर हिस्सा करने को कहा था। राम मूर्ति वाले पहले हिस्से में राम लला को विराजमान कर दिया गया। राम चबूतरा और सीता रसोई वाले दूसरे हिस्से को निर्मोही अखाड़े को दे दिया गया। बाकी बचे हुए हिस्से को सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया गया।