एससी/एसटी वर्ग के क्रीमी लेयर को प्रमोशन में आरक्षण नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केन्द्र सरकार की याचिका

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न्यूज चक्र @ सेन्ट्रल डेस्क
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों (एससी/एसटी) के लिए आरक्षण में भी ‘क्रीमी लेयर’ का नियम लागू होगा।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली संवैधानिक बेंच ने व्यवस्था दी कि संवैधानिक अदालत के पास सबसे पिछड़े वर्गों में से क्रीमी लेयर के लिए किसी भी तरह के आरक्षण को खत्म करने की शक्ति निहित है।
बेंच की तरफ से जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन ने फैसला लिखा। इसमें कहा गया कि अनुसूची में किसी भी समूह या समुदाय को एससी या एसटी में शामिल किया जा सकता है। अदालत इन ग्रुप्स या सब-ग्रुप्स में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को समानता की कसौटी पर लागू कर सकती है।
बेंच ने कहा, “आरक्षण की पूरी व्यवस्था का मकसद नागरिकों के बीच पिछड़े वर्गों को आगे लाना है, जिससे वे भारत के अन्य नागरिकों की तरह समानता के आधार पर हाथ से हाथ मिलाकर चल सकें। ये सम्भव नहीं होगा अगर उस वर्ग की क्रीमी लेयर सार्वजनिक क्षेत्र की सभी नौकरियों पर कब्जा कर ले और इसे जारी रखे। इससे वर्ग के अन्य लोग पिछड़े ही रह जाएंगे जैसे वे पहले थे। ”
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि जब कोर्ट एससी और एसटी पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू करता है, तो यह किसी भी तरह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 से जोड़-तोड़ नहीं करता।
बेंच ने कहा, “अनुसूचियों में शामिल जातियां, ग्रुप्स या सब-ग्रुप्स पहले की तरह ही रहेंगे। ये इनमें केवल वो लोग होंगे जो क्रीमी लेयर से जुड़े होने के कारण अस्पृश्यता या पिछड़पन से बाहर आ चुके हैं और आरक्षण से लाभांवित होने से अलग हो चुके हैं।”
बेंच ने केन्द्र सरकार की एक अपील को खारिज कर दिया जिसमें एससी/एसटी ग्रुप्स में क्रीमी लेयर की अवधारणा को अमान्य करार देने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने कहा अनुच्छेद 14 और 16 के साथ अनुच्छेद 341 और 342 की व्याख्या तालमेल के साथ की गई है। इस तरह ये साफ है कि संसद के पास पूरी स्वतंत्रता होगी कि यह अनुसूचियों में से लोगों को प्रासंगिक कारणों के आधार पर शामिल कर सके या उन्हें निकाल सके।
बेंच ने कहा, “इसी तरह, संवैधानिक अदालतें जब अनुच्छेद 14 और 16 में बताए गए समानता के अधिकार के साथ आरक्षण के सिद्धांत को लागू करती हैं, तो वे अपने अधिकार क्षेत्र में ही रहकर क्रीमी लेयर को ऐसे ग्रुप्स या सब-ग्रुप्स से अलग करती हैं।”
कोर्ट ने कहा कि वह पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की अशोक कुमार ठाकुर केस में दी गई राय से इत्तेफाक नहीं रखता, जिसमें कहा गया था कि क्रीमी लेयर सिर्फ पहचान का सिद्धांत है ना कि समानता का।
केन्द्र सरकार ने 7 जजों की बेंच को 2006 के एम नागराज के फैसले के हवाले से पुनर्विचार के लिए आग्रह किया था, जिसमें कई परिस्थितियों का हवाला दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी ग्रुप्स में क्रीमी लेयर की अवधारणा स्थापित करने के सम्बन्ध में यह फैसला बिल्कुल सही था‌। हालांकि, इसे पिछड़ेपन की जांच के लिए आगे रखना अनुचित था।
बेंच ने कहा, एससी/एसटी समाज के सबसे पिछड़े और कमजोर तबकों में से एक है‌। इसीलिए उन्हें पिछड़ा माना जाता है। इसके बाद राज्यों को इन समूहों के पिछड़ेपन से सम्बंधित आंकड़े जुटाने की जरूरत नहीं पड़ी।
हालांकि, बेंच ने साफ किया कि एम नागराज के फैसले में दो परिस्थितियां थीं – ‘अपर्याप्त प्रतिनिधित्व की मात्रा बताने वाला आंकड़ा’ और ‘कुल प्रशासनिक क्षमता।’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम इसे साफ कर सकते हैं कि मात्रा का आंकड़ा नागराज के फैसले में बताए पैमानों के अनुसार राज्यों को जुटाना होगा। अदालतें इनका परीक्षण कर सकती हैं। हम आगे जोड़ सकते हैं कि डेटा सम्बंधित केडर से जुड़ा होगा।”
कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक क्षमता को हर बार देखना होगा जब भी प्रमोशन किए जाएंगे। बेंच ने केन्द्र सरकार की एक अन्य अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एससी और एसटी की संख्या को देश की कुल जनसंख्या के अनुपात के साथ यह निर्धारित करने में देखा जाना चाहिए कि पदोन्नति के पदों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पदोन्नति के पदों के मामले में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के निर्धारण को राज्यों पर छोड़ा जाना चाहिए।