इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की सलाह-खाने पर नहीं व्यायाम पर ध्यान दें

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न्यूज चक्र @ कोटा
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और मेदांता अस्पताल गुडगांव के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को स्टेशन रोड स्थित उम्मेद भवन पैलेस में ‘न्यूअर एडवांसेज इन कार्डियोलाॅजी फ्राॅम इनवेंशन टू प्रिवेंशन’ विषय पर सीएमई आयोजित की गई। वहीं  ‘रोल आॅफ सोसायटी इन प्रिवेंशन आॅफ सुसाइड’ विषय पर पेनल डिस्कशन हुआ। परिचर्चा में मुख्य वक्ता मेदांता अस्पताल गुड़गांव में इन्टरवेंशनल कार्डियोलाॅजी के एसोसिएट डायरेक्टर डाॅ. नगेन्द्र सिंह चैहान थे।  वहीं विशिष्ट अतिथि राजकीय मेडिकल काॅलेज के प्रिंसिपल एवं नियंत्रक डाॅ. गिरीश वर्मा थे। परिचर्चा में होप सोसायटी के चैयरमेन डाॅ. एमएल अग्रवाल, सुपरिटेंडेंट एनएमसीएच डाॅ. देवेन्द्र विजयवर्गीय व राजस्थान पत्रिका के सम्पादक राजेश त्रिपाठी पेनलिस्ट के रूप में शामिल रहे।
इस अवसर पर डाॅ. नगेन्द्र सिंह चौहान ने कहा कि पहले ब्लॉकेज मापने की कोई मशीन नहीं थी तो अंदाज लगाकर ही इसका प्रतिशत बता दिया जाता था।  अब एफएफआर के द्वारा इसे मापा जा रहा है। एडवांस तकनीक के द्वारा बिना सर्जरी के वॉल्व बदले जा रहे हैं।  दुनिया में पांच साल में 5 लाख ट्रांसप्लांट किए गए हैं, जबकि भारत में केवल 200 ट्रांसप्लांट सम्भव हुए हैं। उन्होंने खास बात यह कही कि कोलेस्ट्रॉल खाने से नहीं बढ़ता है, यह शरीर में स्वतः बनता है।  इसलिए खाने को कंट्रोल करने की बजाए एक्सरसाइज पर ध्यान देना चाहिए।  हफ्ते में, 600 मिनट की एक्सरसाइज हार्ट अटैक से बचा सकती है।
परिचर्चा को संबोधित करते हुए डाॅ. देवेन्द्र विजयवर्गीय ने कहा कि अगर व्यक्ति आत्महत्या करने की कोशिश करता है तो इसके पीछे उसका परिवार और आसपास का वातावरण पूर्ण उत्तरदायी होता है। अभिभावकों का अपने बच्चे से अत्याधिक अपेक्षाएं रखना, उनका तुलनात्मक स्वभाव और नम्बर कम आने पर बुरी तरह डांटना या मारना बच्चे को मानसिक रूप से बहुत परेशान करता है। डाॅ. एसएन सोनी ने कहा कि अभिभावक इसे अपनी जिम्मेदारियों का एक हिस्सा समझते हैं, लेकिन बच्चे के मस्तिष्क पर इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है। अभिभावकों का दायित्व है कि बच्चे को उसकी असफलता का अहसास ही ना होने दिया जाए।
डाॅ. एमएल अग्रवाल ने कहा कि कोई भी व्यक्ति एकाएक आत्महत्या करने के बारे में नहीं सोच सकता। उसे इतना बड़ा कदम उठाने के लिए खुद को तैयार करना पड़ता है और पहले से ही योजना भी बनानी पड़ती है। तनावपूर्ण जीवन, घरेलू समस्याएं, मानसिक रोग आदि कारण परिवारजनों को आत्महत्या करने के लिए विवश करते हैं। महिलाएं अपनी बात दूसरों से शेयर कर लेती हैं, इसलिए उनके आत्महत्या करने की सम्भावना कम होती है। वहीं पुरुष किसी से अपनी परेशानी नहीं कहते, इसीलिए उन्हें आत्महत्या करने से रोकना मुश्किल हो जाता है। अवसाद के बढ़ जाने के कारण लोग अवसाद को बीमारी मानते ही नहीं हैं। इस कारण यह खतरे की सीमा लांघ जाता है। अवसाद लाइलाज बीमारी नहीं है, इसका इलाज सम्भव है।
इस दौरान डाॅ. अविनाश बंसल मोडरेटर के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम में डाॅ. एससी जेलिया, डाॅ. हंसराज मीना, डाॅ. पुरुषोत्तम मित्तल, डाॅ. कुलदीप राणा आदि चिकित्सक भी मौजूद रहे।