नज़रिया: सरकार के फैसले पर इतनी खीज क्यों?

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-राजीव सक्सेना
दस-बीस साल या उससे भी पहले….आजादी से पहले ही नहीं सहस्त्रों वर्ष पहले के किसानों की स्थिति पर भी दृष्टिपात करें तो अधिकतर किसान बदहाल ही मिलते हैं, जमींदारों को छोड़कर। मदर इंडिया के अलावा इस विषय पर बनीं कई अन्य गम्भीर फिल्में, प्राचीन, मध्यकालीन, मुगलकालीन, आधुनिक साहित्य सब इस बात के प्रमाण हैं। इनमें व बाल साहित्य की कहानियों में भी किसी-किसी किसान को ही ‘सम्पन्न किसान’ कहा गया है। आजादी के बाद से अब तक रहीं सरकारें किसानों को बेवकूफ बनाती आ रहीं थीं या उनके हित के लिए वास्तव में दूरगामी नजरिये से योजना बना रही थीं, मैं इन बातों पर तर्क-वितर्क करने की बजाय यही कहना चाहूंगा कि अपने सभी हाथ-पैर खो चुके किसी व्यक्ति को एकदम ही चंगा तो नहीं किया जा सकता ना?
पूरी तरह निराशा-हताशा में डूब चुके अगर उस व्यक्ति को कृत्रिम अंग इम्प्लांट किए जाते हैं, तो क्या यह उम्मीद करना चाहिए कि उसे तुरंत दौड़ लगाने भेज दिया जाए? क्या इतने प्रभावी कृत्रिम अंग हो सकते हैं? भारतीय किसानों के कमोबेश यही हालात हैं। फिलहाल यह कह देना कि किसानों की दशा स्थाई रूप से सुधारने के लिए यह किया जाना चाहिए, वो किया जाना चाहिए, बेहद आसान है। चॉकलेट या आइस्क्रीम का मजा लेने से भी ज्यादा। इन सबसे अलग क्या पहली बार किसानों को दी गई बड़ी राहत का स्वागत नहीं किया जाना चाहिए? इस बात को नहीं देखा जाना चाहिये कि मोदी सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के लिए पहली बार जो कॉन्क्रीट प्लान तैयार किया है, उस पर यह आगे बढ़ भी चुकी है, स्टेप बाय स्टेप क्रियान्वित भी कर रही है, तो क्या इसकी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए? या चूंकि हम विरोधी विचारधारा के हैं या सरकार के इस फैसले से हमारे कुछ निजी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हैं, इसलिए कोसते ही रहना चाहिए?