बेबाक नजरिया: ये हालात कैसे बचाएंगे देश को?

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-राजीव सक्सेना
यूपी पुलिस ने एक साल में ही एक हजार से अधिक एनकाउंटर किए, 40 से अधिक को ढेर कर दिया। अपराधियों की डेढ़ सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति जप्त की। हालात ये हुए कि डरे हुए कई बदमाशों को तो पुलिस के पास खुद समर्पण करने पहुंचना पड़ा। ऐसे में जनता में नाराजगी तो होनी ही है। नकल पर नकेल लगाने से भी बेरोजगारी बढ़ गई है। पहले की सरकारों के राज में ये ‘रोजगार’ जबरदस्त तरीके से फल-फूल रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो खुद टीवी पर कह चुके हैं कि 90 प्रतिशत बच्चे नकल करते हैं। उन्होंने खुद नकल करने की बात स्वीकारते हुए कहा-थोड़ी बहुत नकल तो चलती ही है, इसे नकल नहीं कहते। अब कौनसी जनता होगी जो ऐसे उदार नेता को वापस लाना नहीं चाहेगी। जब राहुल गांधी देश तोड़ने की दुआ करने वालों का उदार ह्रदय से समर्थन कर सकते हैं तो ऐसे अखिलेश का साथ देना तो वाजिब बनता ही है। राहुल की मां तो आतंकी की फांसी पर रातभर रो कर तगड़ा जनसमर्थन पहले ही जुटा चुकी हैं।
मेरी पत्रकारिता के अनुभव से मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि राजस्थान में अशोक गहलोत के प्रथम कार्यकाल का शासन राज्य में अभी तक का सर्वश्रेष्ठ रहा। ‌सरकारी कर्मचारियों की ऐसी तगड़ी लगाम कसी थी कि, वे कहने लगे थे-अब काम करना सीखना पड़ रहा है। मेरे सम्पर्क में ऐसे टीचर तक आए जिनका कहना था-पढ़ा ही अब रहे हैं। शिक्षा विभाग में मिले एक बुजुर्ग टीचर ने तो यहां तक कहा था कि-पढ़ाने की तो आदत ही नहीं हैं, वीआर ले रहा हूं। उसी अशोक गहलोत सरकार को अप्रत्याशित रूप से इन्हीं सरकारी कर्मचारियों के कोप का भाजन बनना पड़ा। मैं उस समय दैनिक भास्कर में सिरोही-जालौर का ब्यूरो चीफ था। चुनाव के काफी बाद खुद कर्मचारियों से ही पता चला कि सिरोही जिले के आदिवासी क्षेत्रों व जालौर के गुजरात सीमा पर स्थित कई मतदान केन्द्रों में समय खत्म होने से एक घंटे पहले ही मतदाताओं की एंट्री रोक दी गई थी। दरवाजे बंद कर दिए गए थे। इसके बाद मतदान दल के कर्मचारियों ने ही धड़ाधड़ बैलेट पेपर से फर्जी मतदान कर डाला। ये उदाहरण ही बताता है कि हमारे देश की अधिकतर जनता भ्रष्टाचार/अपराधों का रोना तो रोती है, मगर जब भ्रष्टाचारियों/अपराधियों पर मार पड़ने लगती है तो, यही लोग बिलबिलाने लगते हैं, सरकार/प्रशासन के विरोधी हो जाते हैं। इसका सीधा सा कारण है कि इसकी चपेट में ये लोग खुद या इनके नाते-रिश्तेदार या अन्य अपने ही आते हैं। ऐसे कितने प्रतिशत सरकारी कर्मचारी) होंगे (इनमें मैं विशेषतौर पर शिक्षकों को भी शामिल कर रहा हूं) जो ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते होंगे। उस पर नेताओं के बारे में तो कुछ कहना/लिखना ही ‘कालिख को काला’ दिखाने के समान होगा ( मात्र गिनती के इसमें अपवाद हैं)। और अब आ जाएं जातिवाद/धर्मवाद पर। भारत में तो कमसे कम सच्चाई यही है कि, आजादी के पहले से फैलना शुरू हुए इस जहर को कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए इतना प्रश्रय दिया कि अब यह कैंसर की तरह फैल चुका, नासूर बन चुका है। राजनीतिक दलों पर जहां देश से इस जहर को निचोड़ फेंकने की जिम्मेदारी थी, मगर वो तो इसे और अधिक इंजेक्ट करते गए। राजनीतिक दल ही इस आधार पर बने हुए हैं। समाजवादी पार्टी, बसपा जैसे बड़े उदाहरण हैं। क्षेत्रीय पार्टियों का अलग बखेड़ा और ब्लेकमेलिंग की राजनीति है। मैं नहीं समझता कि ऐसे माहौल में भारत में सुशासन की आशा की जा सकती है। मुझे तो लगता है अभी हालात और बिगड़ेंगे, बुरी तरह बिगड़ेंगे। भाजपा में भी मोदी चाहे जितना बैलेंस करने की कोशिश करें, मगर इनके कुछ नेता अपने बोल से उनका खेल बिगाड़ देते हैं। भाजपा को भी मजबूरी में ही सही जातिगत आधार तो साधना ही पड़ता है। और तो और कई विवादों में घिरे होने के बावजूद धार्मिक आधार के कारण ही यूनुस खान को भी निभाना पड़ रहा है।
मैं जब नवीं, दसवीं, ग्यारहवीं में पढ़ता था, फिर कॉलेज में आया, हमेशा यह विश्वास रहा कि जैसे-जैसे लोग अधिकाधिक संख्या में शिक्षित होते जाएंगे, देश से जातिवाद, सम्प्रदायवाद, भ्रष्टाचार जैसे दुश्मनों का नाश होता जाएगा। मगर बेहद अफसोस है, हो इससे बिलकुल उलटा रहा है। आरक्षण एक सीमा तक, एक समयावधि तक बेहद जरूरी था, मगर आज इसने देश के हर क्षेत्र में वो गंदगी पैदा कर दी है कि, इस आधार पर देश के भविष्य के बारे में सोच कर ही घुटन होने लगती है। आज सचिवालय भी चले जाएं तो अफसरों तक की जातिगत लॉबी पाएंगे। राजस्थान के सन्दर्भ में कहूं तो आरएएस से लेकर आईएएस तक, अधिकतर का यही हाल है। कर्मचारी संगठन ही जाति-वर्ग के आधार पर बने हुए हों तो, प्रशासनिक कार्यों-फैसलों की हालत सोची-समझी जा सकती है। अभी कुछ दिन पहले बून्दी के एक गांव के सीनियर सैकंडरी स्कूल में नियुक्त एक व्याख्याता के बारे में पता चला। ये व्याख्याता एक जाति विशेष से आते हैं, गांव में भी उसी जाति का बाहुल्य है तो स्वभाविक रूप से स्टूडेंट्स की संख्या भी उनकी ज्यादा होगी। विश्वस्त रूप से पता चला कि वो व्याख्याता परीक्षाओं में अपनी जाति के छात्रों को धड़ल्ले से नकल करवाता है। गांव की सरपंच भी उसी जाति की है तो वो व्याख्याता वहां खुल कर जातिगत राजनीति भी करता है‌। इस एक उदाहरण से भी देश के भयावह भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें खास बात यह है कि यह जाति आरक्षण में भी आती है।
कुछ माह पहले एक खबर ने तगड़ा झटका दिया था कि कैसे दहाई डिजिट तक में नम्बर नहीं ला पाने वाला आरक्षित अभ्यर्थी साइंस जैसे विषय के अध्यापक के लिए चुना गया। ऐसी बहुत सी खबरें पहले भी आ चुकी हैं। डॉक्टरी और इंजीनियरिंग तक में ऐसे अभ्यर्थियों के सलेक्ट होने की खबरें भी आती रही हैं तो प्रशासनिक क्षेत्रों में भी ऐसा हो ही रहा होगा। इस पर भी जातिगत राजनीति करने वाले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो यह मांग तक उठा दी है कि हर जाति को आरक्षण दे दिया जाए, झगड़ा ही मिटेगा। ऐसी सोच केवल उनकी ही हो, ऐसा भी नहीं है। ऐसी सोच ही योग्यता पर कितना बड़ा कुठाराघात है, पीड़ित और कुंठित होती जा रही युवा पीढ़ी ही इस बात को अधिक अच्छी तरह समझती है। यह सोच तो यह कहती है कि किसी जाति का अयोग्य अभ्यर्थी भी हो तो भी आरक्षण का कोटा पूरा करने के लिए उसे ही नौकरी दी जाए, सोचिये ऐसे में क्या होगा इस देश का हाल? राजनीति पर एक बार फिर आते हैं। यहां भी यही हो रहा है। चाहे महाभ्रष्ट हो, बाहुबली हो, निखट्टू हो, जमूरा हो…..मगर जाति-धर्म के आधार के कारण ऐसे व्यक्तियों को भी टिकट देकर चुनाव लड़ाया जाता है। एक राजनीतिक पार्टी का मुखिया तो अपने मसखरे पन के कारण ही विदेशों तक में पहचाना जाता है। जातिगत आधार उसका तगड़ा है, बस! इस दम पर ही उसके कारनामे देश के सामने हैं। अखिलेश यादव ने इस पर भी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि-लालूजी के साथ बीजेपी सरकार अन्याय कर रही है। अब जिस पार्टी के अखिलेश कर्ताधर्ता हैं, उसकी उनके राज्य में जबरदस्त पकड़ का कारण भी समझ में आ जाता है। खुल कर भ्रष्टाचार की पैरवी करते हैं ये। अब देखना है- कौनसी पार्टी, कौनसा नेता देश को बचाने के लिए आत्मघाती फैसला ले पाता है?