नरेश अग्रवाल का राजनीतिक सफर: दिलचस्प और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल

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न्यूज चक्र @ सेन्ट्रल डेस्क
नरेश अग्रवाल समाजवादी पार्टी से अब भारतीय जनता पार्टी की गोद में जा बैठे हैं। उनका सियासी सफर जितना दिलचस्प है, उतना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल उड़ाने वाला भी साबित हो रहा है। वो यूं कि अग्रवाल एक, दो या तीन नहीं अपितु चार राजनीतिक दलों से होते हुए भाजपा में पहुंचे हैं।
कांग्रेस से अपना राजनीतिक व्यवसाय शुरू करने के बाद उन्होंने लोकतांत्रिक कांग्रेस बनाई। इसके बाद सपा व बसपा में घूमते हुए अब भगवा दामन थाम बैठे हैं। नरेश अग्रवाल उन नेताओं में शामिल हैं, जो पिछले दो दशक से कैसे भी हों, सत्ता में बने रहे हैं।
इस तरह घूमते रहे हैं अलग-अलग दलों में
नरेश अग्रवाल मुलायम सिंह की सपा से पहले मायावती की बहुजन समाज पार्टी में रहे, उससे भी पहले वो कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनते रहे। इस प्रकार साफ है कि अपनी लम्बी पारी में नरेश अग्रवाल किसी के भी सगे नहीं रहे हैं। वो वर्ष 1980 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। इसके बाद वे कई बार सपा के टिकट पर विधायक बने। फिर पाला बदला और बसपा के टिकट पर वर्ष 2009 में फर्रुखाबाद संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद वर्ष 2010 में मायावती ने उन्हें राज्य सभा भेज दिया।
अग्रवाल ने ये भी किया-
वर्ष 1997 में नरेश अग्रवाल ने कांग्रेस पार्टी को तोड़कर लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया। वो उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार को समर्थन देकर केबिनेट मंत्री बने। इसके बाद वो कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहे। इसके बाद वर्ष 2003 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार बनी तो उसमें भी कैबिनेट मंत्री बने।
वर्ष 2007 में मुलायम सिंह की सत्ता से विदाई हुई तो उन्होंने सत्ताधारी बीएसपी का दामन थाम लिया। मायावती ने उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ाया, इसमें हारे तो राज्य सभा भेज दिया।इसके बावजूद वो वर्ष 2012 में फिर सपा के हो गए। अभी तक सपा की तरफ से राज्यसभा सांसद थे, लेकिन इस बार अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने उन्हें राज्य सभा सदस्य बनाने से इनकार कर दिया, तो वे भाजपा में चले आए।
68 वर्षीय अग्रवाल यूपी के हरदोई के रहने वाले हैं। करीब चार दशक से राजनीति में सक्रिय हैं। सात बार अलग-अलग पार्टियों से विधायक रह चुके हैं। वर्ष 1980 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर हरदोई से विधायक चुने गए। 1989 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद फिर से कांग्रेस में वापसी कर ली।
1991, 1993 और 1996 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और चुनाव जीत गए। 1997 में इसी कांग्रेस पार्टी के नेताओं को तोड़कर अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी का गठन किया, कल्याण सिंह सरकार को सपोर्ट किया और 1997 से 2001 तक भाजपा सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे।
2002 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ जीते। मुलायम सिंह यादव की सरकार में वो 2003 से 2004 तक पर्यटन मंत्री रहे।
2007 का विधानसभा चुनाव भी उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर ही लड़ा और जीत हासिल की, लेकिन राज्य में बहुजन समाज पार्टी की सरकार आई और मायावती मुख्यमंत्री बनीं।
बसपा की सरकार आते ही अग्रवाल ने सपा छोड़ दी और मायावती का दामन थाम लिया, 2008 में बसपा में आ गए। मायावती के साथ वो तीन साल तक रहे।
2012 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने मायावती का भी साथ छोड़ दिया और फिर से सपा में चले गए। दरअसल, वो अपने बेटे नितिन अग्रवाल के लिए टिकट मांग रहे थे, लेकिन बसपा ने नहीं दिया, जिसके चलते वो सपा के साथ चले गए।

विवादों के साथ नई पारी

 फिलहाल, नरेश अग्रवाल को बीजेपी ने शरण दी है, हालांकि, उनके पार्टी में आते ही विवाद भी शुरू हो गया है। उन्होंने जया बच्चन को लेकर जो बयान दिया उसकी विरोधी ही नहीं पार्टी के नेता व समर्थक भी आलोचना कर रहे है। ऐसे में नरेश अग्रवाल की ये पारी कितनी लम्बी चल पाती है, इसे लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।