अधिकारियों की मनमानी से सूखी फसलों को नहीं मिल रहा पानी

0
214

न्यूज चक्र @ कोटा

नहरों में पानी के रेगुलेशन को लेकर अधिकारियों की मनमानी के कारण किसानों की फसलें सूखने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। चम्बल परियोजना समिति की ओर से रेगुलेशन का जो प्लान बनाकर दिया जाता है, अधिकारी उसे दरकिनार कर राजनेताओं के कहने पर पानी का रेगुलेशन करते हैं। इससे रेगुलेशन का सारा सिस्टम खराब हो चुका है। अधिकारी आॅफिसों में बैठकर मनमानी करते हैं, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। ऐसे दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। चम्बल परियोजना समिति की बुधवार को हुई बैठक में सदस्यों ने एकमत से ये मांग रखी।

समिति की बैठक सीएडी सभागार में अध्यक्ष सुनील गालव की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। गम्भीर बात यह है कि इस अहम बैठक में सीएडी का कोई अधिकारी नहीं पहुंचा। बैठक में पानी रेगुलेशन के गलत वितरण के कारण सूखी फसलों के लिए जिम्मेदारी तय करने और सर्वे कराकर मुआवजा देने का प्रस्ताव पारित किया गया। अध्यक्ष गालव ने कहा कि अधिकारियों की स्थिति ऐसी हो गई है कि चोरी भी करते हैं और चाहते हैं कि कोई यह बात नहीं कहे। पानी वितरण व्यवस्था समितियों को सौंपने की बात तीन महीने पहले ही लिखकर दे दी गई थी। इसके बाद उस पत्र को जयपुर में लटकाकर रखा गया, सचिव तक नहीं पहुंचने दिया गया। इसके बाद पायलट प्रोजेक्ट के तहत कुछ समितियों को यह कार्य सौंपने का समझौता हुआ। जिस पर परियोजना समिति ने सहमति भी दे दी थी, लेकिन उस पर भी कोई काम नहीं हो पाया है। बिना नहरी सफाई के टेल तक पानी नहीं पहुंच सकता है। सांसद और विधायकों की मौजूदगी में सफाई की बात हुई थी, लेकिन सफाई नहीं कराई गई। उन्होंने कहा कि एक्सईएन देवराज शर्मा फील्ड में नहीं जा रहे हैं, उन्हें निलम्बित किया जाना चाहिए। रेगुलेशन के समय पर ही अधिकारी छुट्टी पर चले जाते हैं। इन अधिकारियों के निलम्बित होने तक समितियां कार्य का बहिष्कार करेंगी। वहीं, नहरों पर कोई निर्माण कार्य भी नहीं करने दिया जाएगा।
हरिप्रकाश मीणा ने कहा कि गैंता डिस्ट्रिब्यूटरी में 2 फीट भी पानी नहीं चल रहा है। अधिकारियों की हठधर्मिता और द्वेषता के कारण किसानों को नुकसान हो रहा है। सारा सिस्टम अधिकारी बिगाड़ते हैं और मुकदमे किसानों पर लगाते हैं। हरिशंकर मीणा ने कहा कि जातिसूचक शब्दों से अपमान करके भी मुकदमे हमारे ऊपर ही लगाए जा रहे हैं। उनके पास संसाधन हैं, पुलिस है। हम पानी के लिए चक्काजाम करते हैं तो हमारे ऊपर केस लाद दिए जाते हैं। आज स्थिति यह है कि हेड और टेल दोनों ही सूख रहे हैं। कालिया माइनर पर गेहूं की फसल सूख चुकी है। अधिकारी बुलाने पर भी नहीं आते हैं। यदि आन्दोलन के लिए जयपुर चलना पड़ा तो वहां भी चलने को तैयार हैं।
सेवानिवृत पटवारी दशरथ कुमार ने कहा कि धरातल पर काम नहीं होने के कारण नहरों में ठीक से जल प्रवाह नहीं हो पाता है। जब तक बाडाबंदी ठोस रूप से लागू नहीं होगी, तब तक पानी देना सम्भव नहीं है। गंगानगर में बाड़ाबंदी के कारण पानी भी मिलता है और वसूली भी सौ प्रतिशत होती है। हमारे यहां बाड़ाबंदी के कारण हेड पर ही 40 प्रतिशत पानी वेस्ट हो जाता है। हेड पर अवैध पाइप लगे हुए हैं, जिन्हें हटाने वाला कोई नहीं है। बृजमोहन ने कहा कि नहरों की मेंटिनेंस के लिए आने वाला बजट कम हो गया है और जिम्मेदारी संगमों पर डाली जा रही है। यदि बीच में से नरेगा को हटा दो तो सारा सिस्टम ही समाप्त हो जाएगा। अधिकारियों की ओर से माॅनिटरिंग नहीं की जा रही है। नहरों की सफाई की फोटोग्राफी की जानी चाहिए।
भवानीपुरा के अर्जुनराम ने कहा कि अधिकारियों के भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत हैं, उन्हें एसीबी में कार्रवाई के लिए दिया जाना चाहिए। नहरी कार्याें में नरेगा से होने वाले कार्याें में फर्जी मस्टररोल भरी जा रही है, जिसकी जांच की जानी चाहिए। यदि पानी भी नहीं मिल रहा, भ्रष्टाचार की जांच भी नहीं होती तो इन बैठकों के होने का क्या औचित्य है? हनोतिया के कृष्णकुमार सोनी ने कहा कि यदि 120 गेज पानी नहीं चला तो अधिकारियों को सीट पर बैठने नहीं देंगे। दिलीप सिंह इटावा ने कहा कि नहर को छीलकर साढे़ छह करोड़ का भुगतान उठा लिया गया। इसमें नहर में भरी मिट्टी जलप्रवाह के साथ ही बह गई और साढे़ छह करोड़ भी मिट्टी में मिल गए।