वसुंधरा ने गलती तो सुधारी, मगर मान भी लें तो शायद जनता माफ कर दे!

0
346

न्यूज चक्र @ जयपुर / सेन्ट्रल डेस्क
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने आखिरकार सोमवार को विधानसभा के बजट सत्र में लोक सेवकों (Public Servant) के खिलाफ केस दर्ज कराने से पहले सरकार से मंजूरी लेने सम्बन्धी बिल को वापस ले लिया। विधानसभा के पिछले सत्र में 23 अक्टूबर को ये बिल टेबल किया गया था। भारी विरोध के कारण बाद में इसे प्रवर समिति को सौंप दिया गया। यह सरकार की तानाशाही जिद की बड़ी हार है। विपक्ष ही नहीं पक्ष के लोग भी इस प्रकरण में अपनी सरकार की खिलाफत कर रहे थे। जनता के हर वर्ग में भारी नाराजगी थी। उपचुनाव में भाजपा को मिली तगड़ी शिकस्त के पीछे इसे भी महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। वसुंधरा इस बिल को वापस लेने के साथ अपनी गलती भी मान लें तो शायद उन्हें निकटवर्ती विधानसभा चुनाव में कुछ माफ कर दे।
बिल को वापस लेते हुए सीएम ने कहा कि जिस बिल को हमने लेप्स होने दिया, जब यह कानून ही नहीं बना तो काले कानून की बात करना गलत है। ( हालांकि इसे दबे तौर पर सरकार का अपनी हार स्वीकार करने के रूप में ही देखा जाएगा।) वसुंधरा ने आगे कहा कि इस बिल को वापस ले रहे हैं। ये राजस्थान दंड विधियां संशोधन विधेयक बना ही नहीं था, इसलिए इसे सरकार वापस लेती है।
इस तरह चला घटनाक्रम
गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने इस बिल के लिए 7 सदस्यीय प्रवर समिति का गठन किया था। इसमें 4 सदस्य सत्तापक्ष व 3 सदस्य विपक्ष से रखे गए थे। बिल को लेकर संसदीय कार्यमंत्री राजेन्द्र राठौर ने बजट सेशन की शुरुआत में ही प्रवर समिति को इस बिल पर चर्चा के लिए वक्त बढ़ाने की मांग की थी। इसका अपनी ही सरकार के प्रबल विरोधी भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने भारी विरोध किया था।
यह था बिल का मसौदा
इस प्रस्तावित बिल के दायरे मेंफसरों के साथ नेताओं को भी शामिल किया गया था। सरकार ने इस बिल से पहले जारी किए अध्यादेश में लोकसेवक का दायरा बढ़ा दिया। इसके तहत किसी भी कानून के तहत लोकसेवक कहलाने वाले इसमें शामिल कर दिए। यानी
कि अगर यह बिल पारित होकर कानून बन जाता तो पंच-सरपंच से लेकर विधायक तक पर सरकार की मंजूरी के बिना केस दर्ज नहीं किया जा सकता था।
ये प्रावधान थे बिल में
सरकार दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में संशोधन कर धारा 228 बी जोड़ने के लिए बिल लाई थी। इसके तहत लोकसेवक के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए सरकार से अभियोजन मंजूरी (Prosecution acceptance) लेनी होती। इसकी सीमा 180 दिन तय की गई थी।सरकार से मंजूरी के बिना पुलिस किसी लोकसेवक के खिलाफ मामला दर्ज नहीं कर सकती। कोर्ट भी इस्तगासे से जांच के आदेश नहीं दे सकती।
अब तक सिर्फ गजटेड ऑफिसर को ही लोक सेवक माना गया था, लेकिन इस अध्यादेश में सरकार ने यह दायरा बढ़ा दिया था। सरकार से अभियोजन मंजूरी मिलने से पहले दागी लोक सेवक का नाम और पहचान उजागर करने पर दो साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है। इस प्रकार इस प्रस्तावित बिल में मीडिया के हाथ भी बांध दिए गए थे। इसलिए मीडिया में भी इसकी तगड़ी खिलाफत थी।