राहुल या सचिन का जादू नहीं, जनता की नाराजगी से हारी भाजपा

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न्यूज चक्र @ सेन्ट्रल डेस्क
राजस्थान की अजमेर व अलवर लोकसभा सीट सहित मांडलगढ़ विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के 1 फरवरी को आए परिणामों को राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की जीत के रूप में प्रचारित कर कांग्रेस पार्टी खुशियों में डूबी हुई है। मगर जमीनी हकीकत इससे बिलकुल जुदा है। राजस्थान की जनता की आज भी पहली पसंद तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कारण भाजपा ही है। मगर कई ऐसे मुद्दे और हालात पैदा हुए, जिन्होंने मतदाताओं को इसके खिलाफ मतदान करने को मजबूर कर दिया। मतदाताओं के सामने ऐसे में कांग्रेस के अलावा कोई और विकल्प नहीं होने से ज्यादातर ने वोट को ‘नोटा’ पर डाल बेकार करने की बजाय भाजपा को सबक सिखाना ठीक समझा। भाजपा के लिए खतरे की घंटी तो यह है कि साल की समाप्ति से पहले होने वाले विधानसभा चुनाव तक भी यही हालात बरकरार रहने की अधिक सम्भावना है।
‘न्यूज चक्र’ ने इन उप चुनावों से पूर्व भी राज्यभर में सूत्रों के माध्यम से जनता की नब्ज टटोली थी तो चुनाव परिणामों के बाद भी लोगों की मंशा को समझा। इनमें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं व पार्टी के परम्परागत समर्थकों के अलावा किसी ने भी राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से प्रभावित होने की बात नहीं कही। राहुल की बजाय  प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के प्रशंसक काफी अधिक संख्या में मिले। खास बात यह है कि सचिन के प्रशंसकों में भाजपा समर्थक भी शामिल रहे। बिना किसी हिचक के सभी का मानना था कि राहुल के मुकाबले सचिन बेहद प्रभावी व समझदार हैं। उनमें आत्मविश्वास भी स्वभाविक नजर आता है। सचिन किसी भी परिस्थिति और मुद्दे पर राहुल गांधी की तरह ओवर रिएक्ट करते नजर नहीं आते ना ही वे कभी कोई विवादित वक्तव्य देते हैं। सचिन ने कभी ऐसी कोई बात भी नहीं कही, जिससे उनका मजाक बने। ये उनके प्लस पॉइंट माने गए।

भाजपा की हार के ये कारण आए सामने 

इन सबसे अलग तीनों उप चुनाव में मतदाताओं के भाजपा के खिलाफ वोटिंग करने के अलग-अलग कारण सामने आए हैं। जिनमें सबसे कॉमन कारण तो है महंगाई। केन्द्र व राज्य सरकार के कुछ फैसलों से पड़े प्रभाव ने जनता को नाराज भी कर रखा है। आरएसएस ने ही इन चुनावों से अपने आपको दूर रखा। कर्मचारियों व डॉक्टरों की हड़ताल ने भी जनता को काफी परेशान किया था। इसके अलावा किसानों की नाराजगी भी भारी पड़ी। गौरतलब है कि किसानों के इस असंतोष को वसुंधरा सरकार काफी पहले ही भांप गई थी। इसका खौफ भी उस पर हावी था। इसे वसुंधरा ने भाजपा किसान मोर्चा को सक्रिय करने के अलावा स्वयं अपने स्तर पर भी दूर करने का भरकस प्रयास किया, मगर बात नहीं बनी। अब बात आती है राजपूतों के आक्रोश की। इसे करणी सेना जैसे संगठनों ने अपने हित के लिए ही तूल दिया। आनंदपाल प्रकरण ठंडा हो रहा था तो ‘पद्मावत’ फिल्म को लेकर ऐसी बातें फैला दीं, जो फिल्म प्रदर्शित होने के बाद पूरी तरह गलत साबित हुईं। मगर राजपूत मतदाताओं के दिमाग में वो बातें पूरी तरह घर कर गईं थीं। दोनों लोकसभा सीटों सहित उपचुनाव वाले एक मात्र विधान सभा क्षेत्र में भी राजपूत मतदाताओं की खासी संख्या है। चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस के राजपूत विधायकों सहित अन्य बड़े नेताओं का सपोर्ट भी करणी सेना को मिला, जिससे वे अपने आंदोलन को किसी भी स्थिति में न तो रोकें, ना ही सरकार के आगे झुकें। इन मुद्दों के अलावा बड़ी बात यह भी सामने आई कि भाजपा ने अपने जिन कार्यकर्ताओं व नेताओं के दम पर ये चुनाव लड़ा, उनमें से अधिकतर पूरी तरह निष्क्रिय रहे। निचले स्तर पर तो कार्यकर्ता बेहद उदासीन रहे। दूसरी ओर कांग्रेस इन चुनावों में ‘करो या मरो’ की तर्ज पर उतरी थी। प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट की रणनीति को जिम्मेदार मानें या अशोक गहलोत व सीपी जोशी को भी सुनाई दे गया ‘लास्ट डेंजर अलार्म’, जिससे कि ये सभी नेता एकजुट हो मैदान में दिखाई दिए। इसका असर निचले स्तर के कार्यकर्ताओं पर पड़ा, वे भी लास्ट चांस मान, जोश से भर मुहिम में लग गए। इनका टारगेट बने वो आम मतदाता व किसान जो सरकार से किसी जायज कारण से नाराज थे, ऐसा नहीं था तो अपने हालातों से असंतुष्ट मतदाताओं में गलत कारणों से नाराजगी भरी गई। राजनीति में इसे गलत भी नहीं माना जाता है। इन मसलों के अलावा तीनों सीटों पर कांग्रेस को मिली शानदार जीत और भाजपा को मिली शर्मनाक हार के लिए स्थानीय कारणों के अलावा भाजपा की तात्कालिक गलतियां व कांग्रेस की रणनीति को मिली सफलता भी उत्तरदायी रही। अलवर लोकसभा सीट पर वर्तमान विधायक व वसुंधरा सरकार में केबिनेट मंत्री जसवंत यादव को प्रत्याशी बनाया गया था। इनके प्रति क्षेत्रवासियों की नापसंदगी का नमूना यह रहा कि उन्हें अपनी विधानसभा क्षेत्र तक में जीत नहीं मिली। इसके अलावा इन्होंने चुनाव को कथित रूप से हिन्दू बनाम मुस्लिम का रूप दे दिया था। यह भी उनके खिलाफ गया। इस सीट पर टिकट को लेकर भाजपा में काफी खींचतान भी रही थी। उम्मीदवार घोषित करने में काफी देरी की।

जाति कार्ड भी रहा हावी

अजमेर लोकसभा सीट पर भाजपा ने दिवंगत सांसद सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लाम्बा को उम्मीदवार बनाया। यहां कांग्रेस ने ‘जाट बनाम अन्य जातियों’ का कार्ड खेल दिया। अन्य जातियों में पार्टी प्रत्याशी रघु शर्मा की जाति के ब्राह्मण मतदाताओं सहित भाजपा से नाराज चल रहे राजपूत मुख्य रूप पर शामिल रहे। यह चाल कामयाब रही। इसके अलावा क्षेत्र के बड़ी संख्या में मुसलमान व एससी के मतदाताओं ने भी भाजपा को नुकसान पहुंचाया। इन सबके पीछे सर्व प्रमुख कारण यह सामने आया कि लाम्बा की उनके पिता की तरह जनता में कोई पहचान नहीं थी। वे जनता की पसंद ही नहीं बन सके। मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर बहुसंख्यक धाकड़ जाति के मतदाताओं का लाभ कांग्रेस प्रत्याशी विवेक धाकड़ को भाजपा प्रत्याशी शक्ति सिंह के सामने मिला। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में राजस्थान में भाजपा ने सभी 25 सीटों पर जीत हासिल की थी‌। इस प्रकार उपचुनाव में दो सीटें मिलने से कांग्रेस का लोकसभा में यहां से भी खाता खुल गया।

ये रहे थे परिणाम

अलवर लोकसभा सीट पर कांग्रेस के डॉ. कर्ण सिंह को 1 लाख 96 हजार 496 मतों के अंतर से जीत मिली। यहां कांग्रेस को 6 लाख 42 हजार 416, वहीं भाजपा के जसवंत यादव को 4 लाख 45 हजार 920 मत मिले थे। अजमेर लोकसभा सीट पर कांग्रेस के रघु शर्मा ने 84 हजार 414 मतों के अंतर से जीत हासिल की। शर्मा को 6 लाख 11 हजार  514 व भाजपा के रामस्वरूप लाम्बा  4 लाख  46 हजार 807 मत मिले थे। वहीं मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर विजयी हुए कांग्रेस के विवेक धाकड़ को 70 हजार 146, भाजपा के शक्ति हाड़ा को 57 हजार 170 तथा कांग्रेस के बागी निर्दलीय उम्मीदवार गोपाल मालवीय को 40 हजार 470 मत मिले थे। इस प्रकार इस सीट पर धाकड़ ने निकटवर्ती भाजपा के हाड़ा को 12 हजार 976 मतों से हराया। गौरतलब है कि ये तीनों सीटें भाजपा के कब्जे में थी‌ं। नेताओं की मौत होने से ये सीटें खाली हुई थीं।

करणी सेना को मनाने के लिए सब कुछ किया, फिर भी उसने जश्न मनाया

पहले गुजरात में मिली कड़ी टक्कर और अब राजस्थान की इस हार ने भाजपा को हिला कर डाल दिया है। इसके लिए चिंता की बात यह भी है कि जिस करणी सेना का दिल जीतने के लिए पद्मावत प्रकरण में वसुंधरा सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई, वह फिर भी नहीं पिघली। करणी सेना ने तो भाजपा की इस हार पर जश्न तक मनाया। यह साफ दिखा रहा है कि राजपूतों के वोट भाजपा से खिसक गए हैं।