बून्दी नगर परिषद: लोकेश ठाकुर की सीज की गई लैब के ताले तुरंत खोलने के आदेश

युवा कांग्रेस नेता एवं परिषद में प्रतिपक्ष नेता ठाकुर को मिली बड़ी जीत, उनके द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने से खफा हैं परिषद के आका

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लोकेश ठाकुर

न्यूज चक्र @ बून्दी
कुछ दिन के भीतर ही बून्दी नगर परिषद के सभापति महावीर मोदी और नेता प्रतिपक्ष लोकेश ठाकुर की लड़ाई में नगर परिषद को फिर मुंह की खानी पड़ी। ताज्जुब है कि राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी व ऐसी अच्छी खासी टीम होने के बावजूद मोदी निश्चित मात दिलाने वाले गलत फैसले कैसे ले रहे हैं? उनके ऐसे मनमाने निर्णयों के परिणामों से उनके साथ उनकी पार्टी भाजपा की भी तौहीन हो रही है।
उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व नगर परिषद ने ठाकुर की खोजागेट चौराहे पर स्थित पैथोलॉजी लैब को विभिन्न कारण बताते हुए सील कर दिया था। इनमें यूडीएच टैक्स बकाया होने, भवन के सड़क सीमा तक आने, इससे मार्ग अवरुद्ध रहने जैसे कारण गिनाए गए थे। दूसरी ओर ठाकुर को इस कार्रवाई के दो दिन पूर्व ही इस बात के संकेत मिल गए थे। इसके चलते उन्होंने एहतियातन अदालत में राहत पाने के लिए वाद दायर कर दिया था। गुरुवार को इस पर अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए परिषद की तुरत-फुरत की गई कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए तुरंत लैब के ताले खोलने के आदेश दिए। ठाकुर की ओर से अदालत में बारह वरिष्ठ व बेहद अनुभवी वकीलों ने पैरवी की। इनमें नामी वकील मदनलाल जैन, रंगबल्लभ चतुर्वेदी, प्रमोद बाकलीवाल आदि शामिल थे।

परिषद का कोई तर्क नहीं टिका

नगर परिषद की ओर से अपनी कार्रवाई के बचाव में तर्क दिया गया कि दुकान सड़क मार्ग के अधिकार क्षेत्र में आ रही है। मास्टर प्लान में सड़क की चौड़ाई 80 फीट है। इसके जवाब में ठाकुर के वकीलों ने बताया कि इसी रोड पर परिषद ने 25 फीट छोड़ कर पट्टे जारी किए हैं। भू पट्टियां भी बेची हैं। परिषद ने 2016 में नगर नियोजक, कोटा को चिट्ठी लिख कर कहा था कि मास्टर प्लान के मुताबिक इस सड़क की चौड़ाई 80 फीट करना सम्भव नहीं है। यहां मास्टर प्लान लागू होने से पहले ही काफी दुकानें व मकान बन चुके हैं। इसी सड़क पर कलक्टर, एसपी व जजों के बंगले भी हैं। ऐसे में इन्हें तोड़कर सड़क 80 फीट करना सम्भव नहीं है। मास्टर प्लान में रियायत देकर इन्हें 60 फीट ही रखा जाए। इस पर की प्रतिलिपि भी कोर्ट में पेश की गई। दोनों पक्ष की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने ठाकुर के पक्ष में अपना फैसला दिया।

जानिये क्या है पूरा मामला-
युवा पार्षद एवं कांग्रेस नेता लोकेश ठाकुर अपनी पार्टी के एक बड़े स्थानीय गुट की नीतियों के खिलाफ जाकर भी परिषद में सामने आ रहे भ्रष्टाचारों व मनमाने फैसलों की खिलाफत करते रहे हैं। इसी के चलते राज्य सरकार को कुछ समय पूर्व ही परिषद के एक बड़े फैसले को निरस्त तक करना पड़ा था। हाल ही में ठाकुर के एक इस्तगासे पर पुलिस ने परिषद के सभापति महावीर मोदी के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया है। इसी बीच शुक्रवार (17नवम्बर) को परिषद के छोटे स्तर के अधिकारी ठाकुर की लैब पर पहुंचे और उसे सील कर दिया। कारण बताया गया कि एक वर्ष से भवन का यूडी टैक्स बकाया है।
यह है वास्तविकता-
राजस्थान नगर पालिका अधिनियम की धारा 120 के तहत किसी भी प्रकार का टैक्स सम्पत्ति के मालिक से ही वसूल किया जा सकता है। भवन मालिक ने एक साल पूर्व यूडी टैक्स के 76 हजार रुपए जमा कराए थे। इसके अलावा इस भवन में ही दस अन्य दुकानें किराये पर दी हुई हैं। परिषद ने उन्हें छेड़ा तक नहीं, सिर्फ ठाकुर की लैब को ही सीज किया गया। अगर कोई कर बकाया भी हो तो पहले नगर पालिका अधिनियम की धारा 121 व 122 के तहत 30 दिन के अंदर राशि जमा करने का नोटिस दिया जाता है। सम्पत्ति का मालिक अगर मांगी गई राशि से सहमत नहीं हो तो वह जिला कलक्टर या राज्य सरकार के अन्य अधिकृत अधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है। मगर वह 30 दिन के भीतर न तो अपील करता है, ना ही राशि जमा कराता है तब धारा 130 के तहत मांग का नोटिस दिया जाता है। इसके भी 15 दिन के अंदर राशि जमा नहीं हो तब परिषद के द्वारा धारा 131 के तहत सील करने की कार्रवाई की जा सकती है। इस कार्रवाई के दौरान मौके पर तहसीलदार या परिषद के प्रमुख अधिकारी को मौजूद रहना होता है। मगर इस कार्रवाई को राजस्व अधिकारी द्वितीय रूही तरन्नुम व कनिष्ठ अभियंता जोधराज मीणा ने ही अंजाम दिया। इस प्रकार स्पष्ट है कि लोकेश ठाकुर की लैब को सील करने के लिए की गई कार्रवाई में परिषद की ओर से इनमें से किसी भी नियम की पालना नहीं की गई।
ठाकुर ने यह प्रमुख मुद्दे उठाए और यह परिणाम निकला-
परिषद ने शहर के ऐतिहासिक नवल सागर पर कुछ दुकानें बनाने की योजना घोषित कर कुछ की नीलामी भी कर दी थी। मगर कुछ युवाओं ने इस कार्रवाई को अवैध बताते हुए आंदोलन शुुरू किया। ठाकुर भी इसमें एक प्रमुख आवाज बने, आंदोलन को नेतृत्व दिया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा। दबाव में आई राज्य सरकार ने  सितम्बर माह में यहां मुख्यमंत्री के दौरे को देखते हुए परिषद के फैसले को खारिज कर दिया। परिणाम यह हुआ कि नीलामी दाताओं ने जो 25 प्रतिशत राशि जमा करा दी थी, उसे लौटाना पड़ा। इसके अलावा परिषद के द्वारा एक पट्टा अवैध रूप से जारी कर देने का मामला भी ठाकुर ने उजागर कर इसके खिलाफ न्यायालय में इस्तगासा किया। पुलिस को इस पर नगर परिषद के सभापति सहित अन्य के खिलाफ केस दर्ज करना पड़ा। ताजा मामले में नगर परिषद द्वारा करवाए जा रहे अवैध निर्माणों के टैंडर जारी करने का भी विरोध किया।