फिल्म पद्मावती का विरोध: मेरी बात

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-राजीव सक्सेना
फिल्म देख कर उसकी हर लिहाज से तारीफ करने वाले वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रकाश वैदिक तो निश्चित रूप से संदिग्ध हो सकते हैं। मगर जितना मैं रजत शर्मा और अर्णव गोस्वामी की देश की संस्कृति व इतिहास के प्रति प्रतिबद्धता व कट्टरता को जानता हूं, समझता हूं….उसके हिसाब से उन पर सवाल उठाना सही नहीं लगता। वैसे भी एक बात तो जरूर है फिल्म को सीधे तौर पर बैन किए जाने की मांग की जगह उसकी रिलीज से पहले सम्बन्धित पक्षों के समक्ष स्क्रीनिंग किए जाने की मांग ही उठाई जानी चाहिए थी। संजय लीला भंसाली अब करणी सेना को फिल्म दिखाने को तैयार भी हैं। वहीं सिर्फ प्रोमो देख कर ही फिल्म की पूरी कहानी का इस तरह बखान किया जा रहा है, जैस फिल्म ही देख ली हो। जबकि जिन्होंने फिल्म देखी है, उन पर सवाल उठाए जा रहे हैं, ये अपने आप में अजीब स्थिति है। मैं फिल्मों से भी थोड़ा बहुत जुड़ाव रखने और इसके निर्माण के बारे में मामूली समझ रखने के कारण इतना तो कह ही सकता हूं कि किसी भी फिल्म का प्रोमो फिल्म के कुछ दृश्यों को दिलचस्प तरीके से जोड़ कर बनाया गया मिक्सचर मात्र होता है। कई फिल्मों के तो प्रोमो ऐसे भी बना दिए जाते हैं कि, फिल्म देखो तो वो दृश्य कहीं नजर नहीं आते। इन सब कारणों से उचित तो यही रहे कि करणी सेना के प्रमुखजन भंसाली के आमंत्रण पर पहले फिल्म देख लें। तब सारी स्थिति साफ हो जाएगी। आपत्तिजन दृश्यों की निश्चितता हो जाने पर तो विरोध और भी दमदार हो जाएगा। जो फिल्म देखकर इसकी तारीफ कर रहे हैं, उनकी कलई भी खुल जाएगी। फिर तो हर स्तर तक विरोध करने में सर्व समाज पूरी दमदारी से लगे। हर भारतीय को इसमें साथ आना चाहिए। अपने पूर्वजों के गौरव को बचाने के लिए यह बेहद जरूरी भी होगा।