रिकन्सिड्रेशन (पुनर्विचार), नो प्रॉब्लम……बट डैमेज कंट्रोल, प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम

सीआरपीसी संशोधन अधिनियम प्रकरण

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-राजीव सक्सेना

भ्रष्ट नेताओं व अफसरों से लेकर जज-मजिस्ट्रेट तक को बचाने वाले राजस्थान सरकार के प्रस्तावित विधेयक को अंदर-बाहर हुए भारी हंगामे के बाद मंगलवार को प्रवर समिति के पास पहुंचा दिया गया। इस समिति में शामिल सभी दलों के विधायक इसके भविष्य का फैसला करेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बैकफुट पर आई सरकार ने यह विधेयक ठंडे बस्ते में डाल दिया। वहीं इससे पहले सोमवार रात सीएम वसुंधरा राजे ने खास मंत्रियों को बुला इस पर पुनर्विचार करने की बात कह डाली थी। दूसरी ओर गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने बड़ा खुलासा किया है। वह यह कि इस विधेयक के सम्बन्ध में लागू हो चुका अध्यादेश अभी 42 दिन तक राज्य में प्रभावी रहेगा। मतलब कानूनी रूप से 42 दिन तक तो इस विधेयक के प्रावधानों का डंडा राज्य की जनता और मीडिया के सिर पर टंगा रहेगा।

अब अहम सवाल यह है कि राज्य के इतिहास के इस सबसे अधिक विवादित विधेयक प्रकरण से भाजपा सरकार की छवि को जो भारी नुकसान हुुआ है, क्या चुनाव से पूर्व इसकी भरपाई सम्भव हो सकेगी? भविष्य के गर्भ में है इसका जवाब। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पहले ही विभिन्न कारणों से राज्य की आम जनता में विशेषकर किसान-मजदूर तबके में सरकार के खिलाफ असंतोष देखने को मिल रहा था। यह अलग बात है कि सीएम वसुंधरा राज्यभर में अपने धुंआधार कार्यक्रमों से जनता तक अपनी बात पहुंचाने व उसे संतुष्ट करने के प्रयास में लगी हुई हैं। इसका प्रभाव नजर भी आ रहा था। विपक्ष को भी कोई बड़ा मुद्दा नहीं मिल पा रहा था। मगर वसुंधरा राजे ने बैठे बिठाये विपक्ष का काम आसान कर दिया। साथ ही खुद की छवि को भी आम जनविरोधी बना दिया।

जानिये प्रवर समिति क्या है?

संसद या विधानसभा को अपने कामकाज निपटाने के लिए कई तरह की समितियों का सहयोग लेना पड़ता है। ये समितियां सरकारी कामकाज पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिहाज से भी जरूरी होती हैं। मुख्यतः दो तरह की संसदीय समितियां होती हैं-तदर्थ समिति एवं स्थायी समिति। तदर्थ समितियों का गठन किसी खास उद्देश्य के लिए किया जाता है और उसका अस्तित्व तभी तक रहता है, जब तक कि वह अपना काम निपटा कर रिपोर्ट नहीं सौंप देतीं।तदर्थ समिति मुख्यतः दो प्रकार की होती है- प्रवर समिति और संयुक्त समिति। इन दोनों समितियों का गठन विभिन्न तरह के विधेयकों पर विचार करने के लिए किया जाता है। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सभी विधेयकों को सदन द्वारा विचार के लिए प्रवर समिति या संयुक्त समिति को सौंपा जाए। प्रवर समिति विधेयक के सभी प्रावधानों पर बारी-बारी से विचार करती है, जैसा कि दोनों सदनों में किया जाता है। समिति के सदस्यों द्वारा विभिन्न प्रावधानों के बारे में सुझाव दिए जा सकते हैं।समिति विधेयक में दिलचस्पी रखने वाले एसोसिएशनों, सार्वजनिक निकायों या विशेषज्ञों से भी प्रमाण ले सकती है। विधेयक पर समग्रतापूर्वक विचार करने के बाद प्रवर समिति संशोधनों के साथ सदन को अपनी रिपोर्ट सौंप देती है। समिति के जो सदस्य किसी बिंदु पर असहमत होते हैं, वे अपनी असहमति रिपोर्ट के साथ जोड़ सकते हैं।