भ्रष्ट नेता-अफसरों को बचाने के लिए आ रहा है राजस्थान सरकार का नया विधेयक!

सीआरपीसी में संशोधन के इस विधेयक के पारित हो जाने पर सरकार की मंज़ूरी के बिना इनके ख़िलाफ़ 6 माह तक कोई केस दर्ज नहीं कराया जा सकेगा, इस बीच निश्चित रूप से पीड़ित पक्ष परेशान होकर अपना निर्णय बदल चुका होगा या दबावों के आगे समझौता कर चुका होगा, इस बड़ी अवधि में सबूतों का नष्ट हो जाना भी निश्चित

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न्यूज चक्र @ जयपुर/सेन्ट्रल डेस्क
राजस्थान विधान सभा के सोमवार से शुरू होने जा रहे सत्र में सरकार बेहद विवादित विधेयक लाने जा रही है।  इसमें सभी सांसदों, विधायकों और अफ़सरों सहित जजों तक को विशेष संरक्षण मिल जाएगा। इस विधेयक के पारित हो जाने पर इन सभी के ख़िलाफ़ पुलिस या अदालत में शिकायत करना आसान नहीं रह जाएगा। सीआरपीसी की धारा 156 (3) में संशोधन के इस विधेयक से सरकार की मंज़ूरी के बिना इन सभी पक्षों के ख़िलाफ़ कोई केस दर्ज नहीं कराया जा सकेगा। बेहद चौंकाने वाली बात तो एक और है कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं हो जाती, मीडिया तक में यह खबर नहीं आ सकेगी। इससे भी बड़ी हद पार करने की बात‌ करें तो ऐसे किसी मामले में संदिग्ध/ सम्भावित का नाम लेने पर दो साल की सज़ा भी हो सकेगी। इसके चलते मीडिया जगत में भी इसके खिलाफ भारी आक्रोश सामने आ रहा है।

इस विधेयक के अनुसार किसी जज या पब्लिक सर्वेंट    (सरकारी अधिकारी/कर्मचारी) की किसी गलत लगने वाली कार्रवाई के खिलाफ, जो कि उसने अपनी ड्यूटी के दौरान की हो, आप कोर्ट के जरिये भी एफआईआर दर्ज नहीं करा सकेंगे। ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज कराने के लिए सरकार की मंजूरी लेना जरूरी होगा। सरकार इजाजत नहीं देती है तब 180 दिन के बाद ही उस पब्लिक सर्वेंट के खिलाफ कोर्ट के जरिये एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। (यह अलग बात है कि इस अवधि में पीड़ित पक्ष परेशान होकर अपना निर्णय ही बदल ले या दबावों के चलते सामने वाले पक्ष के सामने झुक जाए या उससे समझौता करने पर मजबूर हो जाए। हो सकता है इस अवधि में अपराध के सबूत ही नष्ट कर दिए जाएं।)
ऐसे अधिकारी/ कर्मचारी का नाम तब तक मीडिया की किसी रिपोर्ट में नहीं आ सकता, जब त‍क कि सरकार उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने कि इजाजत ना दे दे। अगर एफआईआर की मंजूरी से पहले सम्बन्धित पब्लिक सर्वेंट का नाम किसी मीडिया रिपोर्ट में आ जाता है तो 2 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

अध्यादेश जारी
राजस्थान सरकार ने इसका गुपचुप अध्यादेश तक जारी कर दिया है। इस अध्यादेश के मुताबिक, कोई भी लोकसेवक अपनी ड्यूटी के दौरान लिए गए निर्णय पर जांच के दायरे में नहीं आ सकता है, सिवाय कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर 197 के। इतना ही नहीं, किसी भी लोकसेवक के खिलाफ कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं करा सकता है। पुलिस भी एफआईआर नहीं दर्ज कर सकती है। किसी भी लोकसेवक के खिलाफ कोई कोर्ट नहीं जा सकता है और न ही जज किसी लेकसेवक के खिलाफ कोई आदेश दे सकता है। अध्यादेश के मुताबिक, सरकार के स्तर पर सक्षम अधिकारी को 180 दिन के अंदर जांच की इजाजत देनी होगी। अगर 180 दिन के अंदर जांच की इजाजत नहीं दी जाती है तो इसे स्वीकृत मान लिया जाएगा।

दूसरी ओर, राज्य के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया से लेकर संसदीय मामलों के मंत्री राजेन्द्र सिंह राठौड़ तक इस विधेयक की वकालत कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे लोक सेवकों के खिलाफ इस्तगासों के जरिये एफआईआर दर्ज होने के मामलों में कमी आएगी। इनका यह भी कहना है कि विधेयक किसी भी प्रकार से मीडिया के खिलाफ नहीं है।