अखबार मालिकों के ज़ुल्मों के खिलाफ फैसला आने में कुछ घंटे बाकी

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न्यूज चक्र @ नई दिल्ली/कोटा/ सेन्ट्रल डेस्क

मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने की मांग को लेकर सालों से संघर्ष कर रहे देशभर के प्रिंट मीडिया के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए 19 जून (सोमवार) बेहद अहम साबित होने वाला है। इस दिन अपराह्न तीन बजे  जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबार मालिकों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना किए जाने के मामले में  सुप्रीम  कोर्ट के कोर्ट नम्बर तीन में  फैसला सुनाया जाना है। न्यायाधीश रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की खंडपीठ यह फैसला सुनाएगी। इसे लेकर जहां मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे देशभर के पत्रकारों व गैर पत्रकारों में  खुशी की लहर है, वहीं अपने खिलाफ आने वाले सम्भावित फैसले को लेकर अखबार मालिकों की सांसें थमी हुई हैं।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में  देशभर के मीडिया कर्मियों का केस लड़ने वाले वरिष्ठ अधिवक्ताओं में से एक एडवोकेट उमेश शर्मा ने यह जानकारी दी है। मीडिया कर्मियों की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट कोलिन गोेंसाल्विस, परमानंद पांडे और दिनेश तिवारी ने भी पैरवी की है। देश भर के पत्रकार फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहकर इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने के दिल्ली के लिए रवाना हो गए हैं।

उल्लेखनीय है कि अखबार कर्मियों को नवम्बर 2011 से मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन दिया जाना था। मगर देशभर के अधिकतर अखबारों में इसे लागू नहीं किया गया। इनमें राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख समाचार पत्र संस्थान भी शामिल रहे । बड़ी बात तो यह रही कि पत्रकारों को इस वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने की जानकारी ही काफी समय बाद हुई। इसके विरोध में धीरे-धीर साहसी पत्रकार सामने आने लगे और सुप्रीम कोर्ट तथा श्रम विभाग का सहारा लेने लगे। इसी के साथ अखबार मालिकों ने उनका दमन करने व डराने के लिए विभिन्न तरीके आजमाने शुरू कर दिए। इनमें अन्य राज्यों में स्थानांतरण से लेकर सस्पेंड करने, टर्मिनेट करने, झूठे आरोप लगाने, धमकी देकर ऐसे प्रपत्रों पर साइन करवाना कि हम वर्तमान वेतन व सुविधाओं से खुश हैं, मजीठिया वेतन आयोग का लाभ नहीं चाहिए आदि शामिल रहे। यही कारण रहा कि अधिकतर पत्रकारों ने न्यायालय की शरण नहीं ली। मगर तमाम तकलीफें सहन करते हुए भी देशभर के अन्य हजारों पत्रकारों ने यह लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई से पीछे हटने वालों में अधिकतर वे पत्रकार शामिल रहे, जिन्हे अपनी योग्यता पर भरोसा नहीं था। वे ये जानते थे कि अपने इस अखबार से पंगा ले लिया तो किसी और दूसरी जगह काम करने की उनकी काबिलियत नहीं है, कोई भी उन्हे नहीं पूछेगा। इसके अलावा इनमें से कई तो पत्रकारिता के दम पर अपने काले कारनामों से काफी बदनाम हो चुके थे। उन्हें मालूम था कि अखबार छूट गया और लोगों को यह मालूम पड़ गया तो चौराहों पर जूते मार हिसाब बराबर करेंगे।