हास्य-व्यंग्य: छिछोरों की ऐसी बढ़ाई………!

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लेखिका परिचय

  • अस्मा खान
  • शिक्षा: एमए हिन्दी साहित्य, एमजेएमसी, एमएड, एमएसडबल्यू (यूनिवर्सिटी टॉपर), नेचुरोपैथी चिकित्सक।
  • अनुभव व उपलब्धियां: ईटीवी के लिए एंकरिंग, टीवी 99 एवं ईटीवी के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग, देश की प्रथम महिला आईपीएस किरण बेदी से दिल्ली में पंजाब केसरी पुरस्कार से सम्मानित। तेलुगु फिल्मों में अभिनय, शीघ्र रिलीज होने वाली बॉलीवुड मूवी में अभिनेता लव सिन्हा के साथ अभिनय।
  • पति: डॉ. सलीम खान

एनेस्थेटिक, झालावाड़ मेडिकल कॉलेज


 

छिछोरों …………मल्टीप्लेक्स में जब एक टिकट पर 300 रुपए खर्च करके फ़िल्म देखने जाते हो, तब तुम ही होते हो जो अपनी सीटियों ,तालियों से पूरा पैसा वसूल करवाते हो । तुम्हारी छिछोरी हरकतों से ही पता लगता है कि अब 70 एमएम पर्दे पर फ़िल्म शुरू होने वाली है । हम तो ऑनलाइन टिकट बुक करवाते हैं, पर अब भी तुम ज्यादातर पहले की तरह लाइन में लगकर ही टिकट खरीदते हो। टिकट लेने के बाद तुम्हारे चेहरों की खुशी ऐसी…जैसे कोई जंग जीत आए हो । कितनी जिन्दादिली से तुम अपने यारों के साथ उस फिल्म को फुल्ली एन्जॉय करते हो । इन फिल्मों के लिए कैसे सब यार मिल के पैसे इकट्ठा करते हो । छिछोरों तुम्हारे सींक से खड़े बाल, टाइट पतलून ,रंगीन चश्मे और घटिया डीओ की महक……, क्या मस्त अहसास कराती है। अहसास यह भी हो जाता है कि अब 3 घण्टे तक तुम्हारी छिछोरी हरकतें फ़िल्म में कैसे खलल डालने वाली हैं । उस पर छोरियों के लिए तुम्हारी हरकतेें “तौबा” । उनके घर के मर्द तब तुम्हें देख कर खून के घूंट …पर भूल जाते हैं कि तुम्हारी उम्र में वो भी ये सब कर चुके हैं। छिछोरों.. फ़िल्म के शुरू होते ही तुम्हारी सीटियां थियेटर में अलग ही ऊर्जा का संचार कर देती हैं, कितना रोमांच भर जाता है यार । और हीरो की एंट्री का अहसास भी तो तुम्हारी सीटियों, तालियों के शोर से ही तो होता है । डायलॉग के टाइम तुम्हारी डायलॉग डिलीवरी अगर स्क्रिप्ट राइटर सुन ले तो गारंटी है, चक्कर खा जाए। कैसे सेम टाइम तुम मिलता-जुलता डायलॉग बना देते हो…और वो भी “सटायर” मार के ! छिछोरों…मसालेदार गानों पर तुम्हारी सीटियां ही तो होती हैंं, जो  उसे सुपरहिट या हिट डांस नम्बर बना देने की काबिलियत रखती हैं। कुल मिलाकर बात यह है यार छिछोरों कि कोई माने या न माने, फ़िल्म को तो तुम ही हिट बनाते हो । फाइटिंग सीन पर तुम जब कुर्सियों पर उछल-उछलकर शोर मचाते हुए नायक की जीत का जश्न मनाते  हो तो बस पूछो ही मत…क्या समां बंध जाता है । तुम्हारे पूर्वानुमान भी गजब के सटीक होते हैं। सचमुच छिछोरों तुम्हारी मौजूदगी ही तो हमें यह भी अहसास कराती है कि फ़िल्म थियेटर में देख रहे हैं, होम थियेटर पर नहीं। यार छिछोरों, दक्षिण की फिल्मों में तुम्हे नकली नोट उड़ाते ओर गानों पर नाचते देखना भी विरल अनुभव होता है। इंटरवेल में मल्टीप्लेक्स ​के महंगे पोपकॉर्न खाने और कोल्डड्रिंक पीने का अंदाज भी क्या खूब रईसाना होता है। असली मस्ती से तो फ़िल्म तुम ही देखते हो यार । बेफिक्री से पूरी फिल्म एन्जॉय करना कोई तुमसे सीखे। तुम जैसी सीटी बजाने की लाख कोशिशों के बावजूद यह दुर्लभ कला मुझे नहीं आ पाई।                   छिछोरों, तुम्हारी छिछोरी हरकतो  से तो  मुझे भी अक्सर यह  रश्क  होने लगता है कि मैं छोरी क्यों बनी यार ? मन करता है कि तुम्हारी तरह सीटी मारूं , तालियां बजाऊं , हीरो की एंट्री पर बेतकल्लुुफ  होकर शोर मचाऊं, उसके प्रति आकर्षण व रोमांच को खुल कर जाहिर करूं ।  पहले पापा और अब पतिदेव की वजह से ये छिछोरी हरकतें नहीं कर पाती हूं यार । पर अब तो तय कर ही लिया कि अगली फिल्म तुम्हारे साथ आगे की सीट पर बैठ कर, तुम जैसी सीटियां व तालियां बजाते  हुए शोर करते हुए देखूंगी। पता है तुम मन से खराब नहीं हो। तुम्हारी उम्र में सभी ऐसा करते हैं। तो छिछोरों तुम्हारी छिछोरी हरकतों के लिए आज तुम्हे थैंक्स कहने का मन है। तुम्हरी वजह से ही शो के 300 रुपए पूरे वसूल , वो भी फुल एंटरटेनमेंट के साथ । मेरे छिछोरों खुल के ऐसे ही फ़िल्म को एन्जॉय करो बस थोड़ा छोरियों का भी ध्यान रख लिया करो । तुम्हारी अश्लील टिप्पणियां, द्विअर्थी बातें, फूहड़ हंसी तुम्हे छिछोरे का खिताब दिलाती हैं । छिछोरों यार, तुम्हारी एक खासियत यह भी है कि फिल्म खत्म होने पर बाहर निकलते ही झटपट जय प्रकाश चौकसे से भी तेजी से पूरी फिल्म की समीक्षा कर डालते हो। अपनी इन खूबियों से ही तुमने बाहुुुुबली को भी ऐतिहासिक फिल्म बना दिया है। बस आगे भी ऐसे ही लगे रहो।