अभी नहीं थमा बिजलीघरों के निजीकरण का मसला, संयुक्त संघर्ष समिति की वार्ता आज

राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (आरवीयूएन) संयुक्त संघर्ष समिति का आरोप-राज्य के 8 प्रमुख बिजलीघरों के हजारों अभियंता व कर्मचारियों के बुधवार को जयपुर में प्रस्तावित राज्य स्तरीय धरने को विफल करने के लिए प्रबंधन ने दिया वार्ता का न्यौता, कोटा थर्मल के मसले पर भी नहीं मान रहा कोटा थर्मल बचाओ संघर्ष समिति का दावा

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कोटा। राज्य सरकार की पावर प्लाांटों के कथित विनिवेश की साजिश के खिलाफ एकजुट हो प्रदर्शन करते इंजीनियर्स व अन्य कर्मचारी।
कोटा। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इन बेटियों ने लिख कर भेजी अपनी व्यथा।

न्यूज चक्र @ कोटा
राज्य के सरकारी बिजलीघरों को विनिवेश के नाम पर निजी क्षेत्र को बेचे जाने का मुद्दा थमने की बजाय और गर्माने लगा है। दो बड़े बिजलीघरों छबड़ा सुपर थर्मल एवं कालीसिंघ सुपर थर्मल के विनिवेश को राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद इसके लिए टेंडर जारी होने से अभियंताओं, कर्मचारियों व श्रमिकों में गहरा आक्रोष है।        पिछले दो माह से राज्य के प्रत्येक बिजलीघर में आंदोलन कर कोर कमेटी ने राज्य सरकार से अपील की कि 750 करोड़ रुपए के लाभ में चल रहे विद्युत उत्पादन निगम के संयंत्रों को बेचने की बजाय इन्हें पूरी क्षमता पर चला और अधिक बिजली उत्पादन किया जाए।
जयपुर में सीएमडी से वार्ता व सांकेतिक धरना
राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (आरवीयूएन) संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा इस क्रम में बुधवार को निजीकरण एवं विनिवेश के विरोध में विद्युत भवन, जयपुर पर राज्य स्तरीय धरना प्रस्तावित था, लेकिन निगम प्रशासन ने कोर कमेटी को धरना स्थगित कर पहले बातचीत के लिए बुला लिया। समिति के संजय जोशी, रवि प्रकाश विजय, घनश्याम शर्मा व गोविंद राजपुरोहित ने बताया कि कोर कमेटी का दल विद्युत उत्पादन निगम के सीएमडी से वार्ता करेगा। साथ ही प्रत्येक बिजलीघर में निजीकरण के विरोध में सांकेतिक धरना दिया जाएगा।
इससे पहले राज्य स्तरीय धरने में शामिल होने के लिए कोटा, कालीसिंध, छबड़ा व सूरतगढ़ सुपर थर्मल पावर स्टेशन तथा धौलपुर, रामगढ़, गिरल व माही बिजलीघरों के करीब दो हजार कर्मचारियों व इंजीनियर्स ने एक दिन के आकस्मिक अवकाश का आवेदन कर दिया था। इनमें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर अतिरिक्त मुख्य अभियंता स्तर तक के अधिकारी शामिल थे।
मुख्य न्यायाधीश​ को भेजे मार्मिक पत्र, ऐसा है मजमून
राज्य में निगम के सभी सरकारी बिजलीघरों से कर्मचारियों, अभियंताओं व उनके बच्चों ने मंगलवार को राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को 1700 से अधिक पोस्टकार्ड लिखकर जनहित में विनिवेश के खिलाफ प्रसंज्ञान लेने की गुहार लगाई। इनमें शामिल बेटियों ने अपने पत्र में लिखा कि अच्छा कार्य करने वालों के साथ राज्य सरकार यह कैसा व्यवहार कर रही है। वनिता, तान्या, मनीषा, अमिता ने लिखा- क्या सस्ती दरों पर अधिक बिजली पैदा करना अपराध है? हमारे पापा बहुत तनाव में हैं। आप न्याय कीजिए। आकांक्षा, अर्पिता, मधु, आरुषि व मोनिका ने लिखा- चालू बिजलीघरों को अचानक बंद करके सरकार क्या मैसेज दे रही है। ऐसा रहा तो हम पढ़- लिखकर भविष्य में कभी भी सरकारी सेवा में नहीं आना चाहेंगे। आईआईटी कर रहे गौरव गर्ग ने लिखा कि निजी कम्पनियों के दबाव में शर्तों में बदलाव कर देना न्यायसंगत नहीं है।
यह है समिति की मांगें
समिति ने मांग की है कि राज्य विद्युत उत्पादन निगम के कालीसिंध तथा छबड़ा सुपर थर्मल की विनिवेश प्रक्रिया पर जनहित में पुनर्विचार किया जाए, अन्यथा निजी क्षेत्र की मनमानी से जनता को महंगी दरों पर बिजली मिलेगी। इंटरनल अॉडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, जिसमें विनिवेश को गलत बताया गया है। विनिवेश के लिए कंसलटेंट मुंबई की अर्नेस्ट व यंग अॉडिट कम्पनी ने टेंडर प्रक्रिया में निजी कम्पनियों के नियम व शर्तों को एकतरफा मंजूरी दे दी, क्योंकि यही कम्पनी दोनों पक्षों की सलाहकार है। इसकी जांच की जाए।
बड़ा सवाल
अगर समिति के आरोप गलत हैं तो सरकार इस मसले पर सामने आकर जवाब क्यों नहीं दे रही है ? इससे तो यही अभिप्राय है कि सरकार इस मसले पर खामियों को समझते हुए भी किन्हीं कारणों से मनमानी करने पर तुली हुई है। जिसका खामियाजा सीधे तौर पर जनता को बिजली की और अधिक कीमत के रूप में भुगतना होगा।
एक गुट नहीं मान रहा कोटा थर्मल के बारे में दावा
कोटा थर्मल पावर प्रोजेक्ट के निजीकरण की आशंका व इसकी चार यूनिटों को लम्बे समय से बंद रखने के विरोध में कोटा थर्मल बचाओ संघर्ष समिति का करीब दो माह से आंदोलन जारी था। यह सोमवार, 24 अप्रैल को जयपुर में ऊर्जा राज्य मंत्री पुष्पेन्द्र सिंह से हुई वार्ता के बाद खत्म कर दिया गया। संघर्ष समिति का दावा है कि उन्हें मंत्री के निर्देश पर राज्य विद्युत उत्पादन निगम के सीएमडी ने यह लिखित में आश्वासन दिया है कि कोटा थर्मल का न तो निजीकरण किया जाएगा और ना ही इसकी किसी यूनिट को स्थयी रूप से बंद किया जाएगा। वहीं थर्मल के इंजीनियर्स व कर्मचारियों का एक वर्ग इसे राज्य सरकार का छलावा बता रहा है। न्यूज चक्र से बातचीत में कुछ इंजीनियर्स ने कहा कि संघर्ष समिति को दिया गया पत्र किसी भी प्रकार से राज्य सरकार की ओर से जारी किया हुआ नहीं है। वह एक सादे कागज पर ही टाइप किया हुआ है। उसमें भी मात्र यही लिखा है कि कोटा थर्मल पावर  स्टेशन की इकाइयों को वर्तमान में बंद अथवा विनिवेश किए जाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। यह पूरी तरह से गोलमोल भाषा व ऐसा कागज है, जिसकी कोई मान्यता नहीं है। इन इंजीनियर्स का यह भी दावा है कि साफतौर पर सरकार कोटा थर्मल को भी निजी हाथों में सौंपने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी के तहत इस भीषण गर्मी में भी इसकी यूनिटों को बंद किया गया है। जबकि बिजली की कमी के चलते कटौती भी की जा रही हैै। आगे छबड़ा पावर प्रोजेक्ट की बिजली दर कम बता कर कोटा थर्मल के विनिवेश का बहाना तलाश कर लिया जाएगा।