वंदना की ‘कोशिश’ बनी जुनून, झिलमिला उठे बुझते ‘दिये’

    शिक्षा नगरी कोटा में वंदना गुप्ता की स्वयंसेवी संस्था 'कोशिश' की बदौलत बेहद गरीब परिवारों के कक्षा-1 से 10 वीं तक में पढ़ने वाले 50 बच्चों को मिल रही है विभिन्न विषयों की नि:शुल्क कोचिंग, अपने घर को ही बनाया पाठशाला

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    वंदना गुप्ता

    अरविन्द गुप्ता @ कोटा 
    किसी की छोटी सी लगने वाली एक ‘कोशिश’ किसी दूसरे की जिन्दगी के सबसे बड़े सपने को पूरा कर सकती है। जरूरत होती है तो सिर्फ उस ‘कोशिश’ को जुनून बना लेने की। ऐसा ही कुछ पुलिस लाइन के सरकारी स्कूल में बच्चों को रोज दो घंटे नि:शुल्क साइंस पढ़ाने वाली शिक्षिका वंदना गुप्ता के जज्बे से साफ झलकता है। इन्होंने देशभर में शिक्षा नगरी के नाम से प्रसिद्ध कोटा शहर में स्वयंसेवी संस्था ‘कोशिश’ के जरिये मुरझाई हुई कोपलों में नवजीवन का संचार करने जैसा काम कर दिया है।
    जुलाई, 2016 में गोपाल विहार स्थित अपने घर में वंदना ने 8 गरीब बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाने की जो शुरुआत की थी, वह अब 50 बच्चों के साथ काफी आगे बढ़ चुकी है। कहा यूं जा सकता है कि जिन जीवन रूपी दियों का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय लग रहा था, आज उनकी लौ उल्लास व नई आशा से झिलमिलाले लगी है।’कोशिश ऐसी स्वयंसेवी संस्था है, जिसमें आसपास की बस्तियों में रहने वाले बेलदार, दिहाड़ी मजदूर, कारीगर, प्लम्बर, ड्राइवर, ऑटो चालक, पेन्टर, सब्जी बेचने वाले आदि गरीब परिवारों के बच्चे सुबह सरकारी स्कूल की पढ़ाई के बाद रोज शाम को दो घंटे पढ़ने के लिए आते हैं।

    41 वर्षीय वंदना ने वनस्थली विद्यापीठ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से एमएससी की थी। उनके पति नीलेश गुप्ता स्कूली बच्चों के केरियर काउंसलर हैं ।

    बेमिसाल हैं गुदड़ी के लाल
    ‘कोशिश’ का ही कमाल है कि बोरखेड़ा के एक ईंट मजदूर का 4 वर्षीय बेटा रोहित अपने से बड़े बच्चों को भी दिमागी मुकाबले में पीछे छोड़ रहा है। उसके माता-पिता अनपढ़ हैं, लेकिन उसे नर्सरी में ही 15 तक पहाड़े याद हैं। कॉपी में 100 अंकों तक वह इंग्लिश में स्पेलिंग लिख देता है। बांयें हाथ से लिखते हुए वह प्राइवेट स्कूल के बच्चों को भी पीछे छोड़ रहा है। उसके मुंह से कविताएं और कहानियां सुनकर दंग रह जाएंगे। बड़ा होकर वह इंजीनियर बनना चाहता है।
    अटवाल नगर की एक झोपड़ी में गुजारा कर रहे बेलदार गब्बू पारगी का बेटा विनीत सरकारी स्कूल में कक्षा-6 का छात्र है। वह भी रोज दो घंटे ‘कोशिश’ में इंग्लिश व गणित पढ़ता है। मां कांता ने बताया कि छोटे बेटे आदित्य और आजाद हैं। बेटी मोनिका को मकान मालिक स्कूल में पढ़ा रहे हैं। वे बच्चों को पढ़ाने के लिए यहां मजदूरी कर रहे हैं। इसी बस्ती में एक टापरी में रहने वाले सुरेश सिगाड़ और पत्नी हीराबाई दोनों दिहाड़ी मजदूर हैं। बेटे श्रवण कक्षा-6 में और करण कक्षा-7 में सरकारी स्कूल से आकर ‘कोशिश’ में पढ़ने जाते हैं। बेटी माधुरी 10वीं में पढ़ रही है। उन्हें हफ्ते में दो दिन ही मजदूरी मिल पाती है। चूल्हे पर रोटी बनाने वाली हीरा को भरोसा है कि ‘कोशिश’ संस्था की बदौलत उसके बच्चे पढ़कर कुछ बन जाएंगे।
    बीपीएल परिवार के कुलदीपक, उड़ान पायलट बनने की
    सहरिया क्षेत्र के एक कारीगर की तीन बेटियां भी ‘कोशिश’ में पढ़ने आती हैं। भारती व खुशबू जुड़वां बहनें हैं। जबकि दिव्या कक्षा-6 में हैं। तीनों मेहनत से पढ़ते हुए बहुत खुश हैं। नेपाली चौकीदार विक्रमराव एक मकान के अहाते में रहता है। उसके दो बेटे हेमंत कक्षा-6 और कुलदीप कक्षा-4 में हैं। ‘कोशिश’ में हिंदी, इंग्लिश और मैथ्स खूब लगन से पढ़ते हैं। भविष्य में वे आगे पढ़कर पायलट बनने का ख्वाब देखते हैं। बोरखेड़ा में बेलदार की बेटी जया सरकारी स्कूल में कक्षा-3 में है। यहां पढ़ते हुए उसमें आगे पढ़ने का आत्मविवास जाग उठा। 9वीं में पढ़ रहा ड्राइवर का बेटा पंकज, सेल्समैन कैलाश अग्रवाल का बेटा कर्तव्य और कक्षा-6 में पढ़ रही बहिन छवि यहां पढाई में अव्वल हो गए। प्लम्बर हेमराज मीणा के बेटे कमल ने यहां तैयारी करके क्लास-10 की परीक्षा दी, अब खुद भी यहां छोटे गरीब बच्चों को पढ़ाएगा।
    हम भी बड़े होकर अपने जैसों को पढ़ाएंगे
    पेन्टर अमृतलाल का कक्षा 6 में पढ़ने वाला बेटा इंग्लिश व मैथ्स के नाम से ही कांपता था, मगर आज वह इन विषयों में पारंगत हो चुका है। ‘कोशिश’ में आकर  उसने एक साल तक खूब मेहनत की थी। बड़ा होकर वह पुलिस अधिकारी बनना चाहता है। एक पार्क में ‘कोशिश’ के बच्चों ने प्ले ग्राउंड भी विकसित किया है। बेलदार जमनालाल का बेटा सुनील अभी कक्षा-7 में है, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम की जीवनी से इतना प्रभावित है कि वह उन्हीं की तरह वैज्ञानिक बनने के लिए खूब मेहनत करना चाहता है। मोनू अभी कक्षा-6 में है, वह ‘कोशिश’ में आकर इंग्लिश सीख गया। पिता रामनिवास बेलदार हैं। मोनू भविष्य में डॉक्टर बनकर गरीबों का नि:शुल्क इलाज करना चाहता है। बेलदार शिवनारायण का बेटा बबलू मेवाड़ा यहां दोस्त बनकर उसे पढ़ाता है। यहां इंग्लिश व वैदिक मैथ्स सीख चुका बेलदार का बेटा विष्णु अब गर्मी की छुटिट्यों में अन्य छोटे बच्चों को इंग्लिश पढाएगा। वह फौज में जाना चाहता है। यहां एक साल से पढ़ने आ रहा 9 वीं कक्षा का छात्र शेंकी सोनी जोा से कहता है कि- हम भी बड़े होकर गरीब बच्चों को जरूर पढ़ाएंगे।
    नींव खोदने वाले कालू भील की बेटी कृष्णा यहां अपने जैसे बच्चों को देख खुश होती है। मां झोपडी में रहती है। वह कक्षा-5 से यहां पढ़कर कुछ बनना चाहती है। प्लम्बर की बेटी दीपिका कक्षा-10 की परीक्षा देकर अब बच्चों को मैथ्स पढ़ाएगी। जयहिंद नगर के मजदूर बद्रीलाल की बेटी हेमा और बेलदार रोडूलाल की बेटी करण कक्षा-8 में हैं। करण की मां नहीं है, उसका भाई विकास भी यहां पढ़ रहा है। बोरखेड़ा के अबरार व वहाब भी यहां रोज पढ़ने आते हैं।
    पढ़ाने का जज्बा हो तो ऐसा..
    शहर के गरीब बच्चों को प्राइवेट स्कूलों की तरह नि:शुल्क शिक्षा देने से ‘कोशिश’ में 50 बच्चों का कारवां बन गया, तो उन्हें नि:शुल्क पढ़ाने वालों की संख्या भी बढ़ गई। आर्मी स्कूल से रिटायर्ड 61 वर्षीय स्नेहलता शर्मा यहां इंग्लिश और  मैथ्स की क्लास लेती हैं। रंगतालाब के गवर्नमेंट स्कूल में 10 वीं का 100 प्रतिशत रिजल्ट देने वाले शिक्षक रमेश जैन यहां 9वीं व 10वीं के बच्चों को इंग्लिश में दक्ष कर रहे हैं। गरीब बच्चों को पढ़ाना उनकी रूचि है। 4 माह पूर्व एक हादसे में उनकी पत्नी की मौत हो गई थी। बीएड कर चुकी बेटी हर्षिता भी यहां बच्चों को पढ़ाने आ जाती है। उसे बहुत सुकून मिलता है। प्रतापनगर में ऑटो चालक की पत्नी आशा सिंह के 2 भी बच्चे यहां पढ़ते हैं। प्राइवेट स्कूल टीचर शशि शर्मा कक्षा-1 से 5 तक के बच्चों को नि:शुल्क मैथ्स पढ़ाती हैं। व्यवसायी संजय सिंह हफ्ते में 2 दिन यहां आकर बच्चों की एक्टिविटी क्लास में योगा, स्पोटर्स और कैम्प करते हैं।
    लाइब्रेरी के लिए मिलीं 500 किताबें
    सोशल मीडिया पर ‘कोशिश’ के मिशन से प्रभावित होकर लोगों ने लाइब्रेरी के लिए उपयोगी बुक्स भेंट की हैं। बच्चों के लिए यहां साइंस, इंग्लिश, मैथ्स के अलावा विभिन्न अकादमिक पुस्तकें, कहानी, जीवनियां सहित डिक्शनरी भी मौजूद है। एक माह में ही 500 किताबों का संग्रह हुआ है। कुछ परिवार अपने बच्चों के जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ या अन्य अवसर पर बच्चों को कपड़े, स्कूल बैग, बॉक्स व अन्य वस्तुएं वितरित करते हैं। इस मदद से गरीब बच्चे प्राइवेट स्कूल के छात्रों की तरह दिखने लगे हैं।

    कोटा। ‘कोशिश’ संस्थान में पढ़ने वाले बच्चे अभिभावकों के साथ।
    कोटा। ‘कोशिश’ संस्थान में पढ़ने वाले बच्चे अभिभावकों के साथ।

     

    कोटा। ‘कोशिश’ संस्थान में अध्ययन करते गरीब बच्चे।