नारीवाद और साहित्यिक धरातल: डॉ. मीता शर्मा

    *अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के अवसर पर वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. मीता शर्मा का विचारोत्तेजक लेख*

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    *हिन्दी महिला कथाकार प्रभा खेतान की सन् 2003 में प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक ‘उपनिवेश’ में स्त्री जीवन के दो पक्षों एक तो उपनिवेश और दूसरा पक्ष स्त्री को उजागर करती है। परन्तु न तो इस उपनिवेश को समझना आसान है और न ही स्त्री को। यह उपनिवेश वह नहीं है जिससे बीसवीं सदी के मध्य में कई देशों और सभ्यताओं ने मुक्ति पाने के लिए संघर्ष किया और विजयी रहे। यह तो वर्तमान उपनिवेश है। यह अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और भूमण्डलीकरण का उपनिवेश है। पितृसत्ता, सैक्स और पुरुष-वर्चस्व की ज्ञान मीमांसा का उपनिवेश है, जो मनो जगत से व्यवहार जगत तक और राजसत्ता से परिवार तक फैला हुआ है। स्त्री इस उपनिवेश की विरोधी शक्ति होते हुए भी इसके बीच में खड़ी है। स्त्री अस्मिता के लिए प्रयासरत-परन्तु इस उपनिवेश के वर्चस्व से उसका मनोजगत आज भी आक्रान्त है-यही स्थिति स्त्री-विमर्श का मूल उत्स है, नारीवाद का मूल कारण है, मूल धरातल है।
    अब प्रश्न यह है कि नारीवाद क्या है? एक राजनीतिक अवधारणा के रूप में नारीवाद 20 वीं शताब्दी की देन है। 1960 के दशक से यह विचार महत्वपूर्ण हो गया है कि स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अलाभ की स्थिति में हैं और उसका प्रमुख कारण जैविक विभिन्नता नहीं वरन् समाज द्वारा निर्मित कृत्रिम कारण हैं, जिन्हे चुनौती दी जानी चाहिए। स्त्रियों को वैधानिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकार व स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
    इस संदर्भ में फ्रेंच लेखिका सिमॉन द बाउवार की पुस्तक ‘द सैकण्ड सैक्स’ को आधुनिक नारीवाद के विकास में मील का पत्थर माना जाता है। यह पुस्तक 1957 में मूलत: फ्रेंच भाषा से अंग्रेजी में अनुदित होकर प्रकाशित हुई और हिन्दी लेखिका प्रभा खेतान ने ‘स्त्री उपेक्षिता’ शीर्षक से इसका हिन्दी में अनुवाद किया ।
    द सैकण्ड सैक्स को नारीवादी आन्दोलन की बाइबिल कहा गया । सिमॉन द बोउवा ने लिखा है कि ”स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। दोष उसका फीमेल रूप में पैदा होने में नहीं है, अपितु दोष तो समाज में प्रचलित और मान्यता प्राप्त लैंगिक भेद में है, जो उसे समता, स्वतंत्रता और समानता के मौलिक अधिकार से वंचित रखते हैं। स्त्री को इस पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। स्त्री को व्यक्ति नहीं, वस्तु समझा गया। जब भी वह ऑबजेक्ट से सब्जेक्ट बनने का प्रयास करती है, दमन का शिकार हो जाती है। नारीवाद आन्दोलनों में सिमॉन द बोउवा के बाद नाम आता है हेलेन फिशर का। हेलेन फिशर ने सैकंड सैक्स को फर्स्ट सैक्स में बदल दिया । उसने अपनी पुस्तक द फर्स्ट सैक्स: द नैचुरल टैलेंट ऑफ वुमन एण्ड हाऊ दे आर चेन्जिंग द वर्ल्ड में नारी को प्रथम सैक्स की संज्ञा देते हुए कहा कि स्त्री बुद्धि, तर्क भाषा और प्रबंधन की दृष्टि से पुरुष से आगे है। नई सदी जो हाईटेक होगी, वह स्त्री की सदी होगी।
    1963 में एक और पाश्चात्य लेखिका बेट्टी फ्रीडन की पुस्तक ‘द फेमिनिन मिस्टीक’ इतनी चर्चित और लोकप्रिय हुई कि उसने कई मुक्ति आन्दोलनों को जन्म दिया। 1970 में प्रकाशित केट मिलेट की पुस्तक सेक्सुअल पॉलिटिक्स, 1971 में प्रकाशित जर्मेन ग्रीर की पुस्तक ‘फीमेल यूनिक व रॉबिन मॉर्गन की ‘सिस्टर इुड इल पॉवरफुल पुस्तकें आईं, जिन्होंने पितृसत्तात्मक समाज और लिंग भेद पर आवाज बुलन्द की। ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल अर्थात् जो निजी है वही राजनीति है, नारीवाद का प्रिय मुहावरा बन गया। नारीवाद का मानना है कि राजनीति सरकार तक ही सीमित नहीं, हर स्थल राजनीति का है। जहां पर सामाजिक तनाव और संघर्ष होता है। परिवार क्षेत्र भी राजनीति का है। इस दृष्टिकोण से यौन असमानता का प्रश्न स्त्री-सुरक्षा और अधिकार का प्रश्न और सत्ता का प्रश्न भी राजनीतिक हो जाता है। इस दृष्टिकोण का लाभ यह हुआ कि राजनीति और अर्थव्यवस्था में स्त्री की सक्षमता को सम्मिलित कर साहित्य में स्त्रीे विमर्श को नई दशा दी गई।
    साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं उसकी समीक्षा भी है और साहित्य समाज प्रति विद्रोह भी है। इसी दृष्टि को ध्यान में रखकर स्त्री साहित्य सामने आ रहा है। नारी अस्मिता अब साहित्य का नया विमर्श बन चुका है। इस उत्तर आधुनिक युग में विश्व की आधी आबादी नारी शक्ति-हाशिए पर है। इसीलिए साहित्य में नारी की अस्मिता अस्तित्व बोध, आर्थिक सामाजिक स्वातन्त्रय के मुद्दों को लेखिकाएं पुरजोर अभिव्यक्ति दे रही हैं।
    मीरा से लेकर महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, सूर्यबाला, कृष्णा सोबती, नासिरा शर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, मनू भण्डारी, मृदुला सिन्हा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, रोहिणी अग्रवाल, गीतांजलि, श्री चित्रा मुद्गल, सुधा सिंह जैसी लेखिकाओं की रचनाओं ने जहां ‘नारीवादी लेखन को अभिव्यक्ति दी है तो उस पुरुष लेखन की सीमा को भी उजागर किया है जो अपने सारे नेक इरादों के बावजूद पुरुष दृष्टि से उभर नहीं पाते ।
    इसीलिए यह सवाल उठता है कि स्त्री साहित्य किसे कहा जाए ? स्त्री की भाषा और उसकी मूल्य चेतना को स्त्री लेखिका ही उजागर कर सकती है या पुरुष भी उस भावबोध से गुजर सकता है
    नारीवाद का साहित्यिक धरातल तब पूर्ण और सशक्त बन सकता है जब-
    1. स्त्री विमश को लेखन में स्त्री लिंग के बजाए एक व्यक्ति बने।
    2. स्त्री को यह चेतना जगानी होगी कि स्त्री और पुरुष के प्रेम के साथ वह स्त्रीत्व से मुक्त रह सके। स्त्रीवादी साहित्य में जेंडर मुक्त चिन्तन की आवश्यकता है।
    3. स्त्री साहित्य का अलग से इतिहास लिख जाए, स्त्री भाषा को पहचान और स्वीकार्यता मिले। स्त्री मुक्ति, स्त्री संस्कृति को स्थापित करे। स्त्री साहित्य के इतिहास के सम्बन्ध में उसे तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-1. स्त्री से सम्बन्धित साहित्य – जिसमें परम्परा की पहचान आती है।2. स्त्रीवादी साहित्य – जिसमें विद्रोह के स्वर की पहचान हो।3. स्त्री केन्द्रित साहित्य – जिसमें नारी अस्मिता की पहचान सर्वलक्षित हो।
    इन तीन भागों में बांटकर – स्त्री साहित्य को एक विश्व साहित्य के रूप में देखा जा सकता है।
    सार रूप में कहा जा सकता है नारीवाद पुरुष से अलगाव में नहीं वरन् उस स्त्री से मुक्ति में है जो पुरुष के दमन का शिकार होती है।