जैन मुनि विश्रान्त सागर महाराज ने बताया मोक्ष का मार्ग

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न्यूज चक्र @ बून्दी
जैन मुनि श्री 108 विश्रान्त सागर महाराज ने कहा कि मन का स्थिर होना आवश्यक है। ऐसा नहीं होने पर वह अनर्गल बातों में भटकता रहता है। मन की चंचलता मोक्ष मार्ग में बाधक है। विश्रान्त महाराज गुरुवार को गुरुनानक कॉलोनी में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित कर रहे थे।
मुनि श्री ने मन को बंदर के समान बताते हुए कहा कि जिस प्रकार चंचल बंदर को रस्सी से बांधकर काबू किया जाता है, उसी प्रकार चंचल मन को ज्ञान रूपी रस्सी से बांधकर स्वर्ग का रास्ता, मोक्ष मार्ग का रास्ता तय किया जा सकता है। उनका कहना था कि मन और पानी दोनों में समानता है। दोनों को ऊपर ले जाने के लिए पावर की जरूरत है। संयम के साथ वैराग्य की भावना से पुरुषार्थ करने से मोक्ष का रास्ता तय किया जाता है। उन्होंने व्यक्ति के संयमी व वैरागी होने की आवश्यकता भी बताई।
मुनि श्री ने कहा कि आज मोबाइल से संस्कारों का पतन हो रहा है। इससे कई प्रकार की विकृतियां, बिमारियां उत्पन्न हो रही हैं। मोबाइल की जगह अगर जिनवाणी दे दी जाए तो समाज की कुरीतियां दूर हो जाएं। तब संस्कारों का उत्थान होगा, परिणामों में निर्मलता आएगी। पंचम काल में पापियों को पाप से तारने, अहंकारियों के अहंकार को नष्ट करने में मात्र जिनवाणी ही सक्षम है। जैन दर्शन भावों की पुष्टि करता है। भावों में अगर निर्मलता है, विशुद्धि है तो परिणाम भी निर्मल होंगे, मन स्थिर होगा।
मनोज जैन व पदम कुमार जैन ने बताया कि मुनिश्री के प्रवचन से पूर्व शिव मंदिर में उनका केश लोच हुआ। सीमा कोटिया ने मंगलाचरण व संस्कृति ने गुरू की महिमा पर भजन प्रस्तुत किया। अशोक कुमार गर्ग व ओम प्रकाश ने दीप प्रज्वलन किया। पाद् प्रक्षालन करके दुर्लभ जैन आतरदा ने मुनिश्री का अशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर पवन जैन, महेन्द्र हरसौरा, प्रवीण बोरखण्डिया व नमन जैन के साथ बड़ी संख्या में अन्य धर्म प्रेमी मौजूद थे।