तौहीन बर्दाश्त के बाहर, शहाबुद्दीन को वापस जेल भेजने की तैयारी में लगे नीतीश

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सेन्ट्रल डेस्क/पटना @ न्यूज चक्र


दो दिन तक शहाबुद्दीन की रिहार्इ के मसले पर ही नहीं शहाबुद्दीन के साथ लालू प्रसाद यादव की चुप्पी के कारण भी हो रही भारी छिछालेदार के बाद आखिर अब जाकर नीतीश कुमार का खून खौल उठा दिखता है। सोमवार को दिन चढ़ने के साथ ही मंत्रीमंडल की आपातकालीन बैठक बुलाई। इसमें शहाबुद्दीन पर सीसीए (क्राइम कंट्रोल एक्ट) लगाए जाने की योजना की खबरें हैं। इसके लिए कानूनविदों व सरकारी वकीलों से भी चर्चा हो रही है। ताकि शहाबुद्दीन को वापस अपने सही ठिकाने (जेल) में भेजा जा सके।

दरअसल शहाबुद्दीन की रिहाई, उसके ठीक बाद उसका नीतीश कुमार पर तंज कसना, उस पर चुप्पी के साथ लालू यादव का उसे मिलता दिखा समर्थन…… बिहार सरकार ही नहीं आरजेडी व जेडीयू के लिए मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ने के समान हो गया। नीतीश को आशा नहीं थी कि शहाबुद्दीन उनकी इतनी छिछालेदार करेगा। इधर, जो समाचार सामने आ रहे हैं, उनसे साफ है कि अगर सरकार अदालत में उसकी जमानत का ठीक से विरोध करती तो शहाबुद्दीन बाहर ही नहीं आ पाता। मतलब साफ है कि नीतीश ने उसकी जमानत को समर्थन दिया था। मगर उनका यह फैसला उनके साथ उनकी सरकार पर ही भारी पड़ता दिखा। आमजन में तगड़ी नाराजगी है। यहां तक कि शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर आते ही कहा कि लालू यादव ही उसके नेता हैं। नीतीश तो परिस्थिति के मुख्यमंत्री हैं। फिर भी नीतीश चुप रहे। उन्हें आशा रही होगी कि लालू उनका साथ देकर शहाबुद्दीन को लताड़ लगाएंगे। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मतलब नीतीश ने जो कल्पना भी नहीं की थी वो सब हो गया। उनकी सरकार की नीति पर ही कालिख पुत गई। विरोधी पार्टियों का तो विरोध सामने आना ही था। मीडिया भी तब से इन खबरों से अटी पड़ी है। उस पर शहाबुद्दीन के बाहर आते ही उसकी गाड़ियों का काफिला जिस तरह बिना टोल चुकाए फर्राटे से गुजरा, यह सब कुछ किसी एक्शन से भरी हुई बॉलीवुड फिल्म के रोमांचक सीन की तरह था। जो सरकार के प्रति लोगों में भारी असंतोष पैदा कर देता है। इस घटना ने तो नि:संदेह इस बात पर पूरी तरह मुहर लगा दी कि बिहार में वास्तव में लालू के वो पुराने दिन अर्थात माफिया राज लौट आया है। दो दिन तो नीतीश को कुछ नहीं सूझा। मगर अब तीसरे दिन सोमवार को इमरजेंसी स्टाइल में डेमेज कंट्रोल में लगे। तुरत-फुरत मंत्रीमंडल की बैठक बुलाई। उसमें शहाबुद्दीन के मसले पर चर्चा जारी रहने की खबर है। माना जा रहा है कि सीसीए लगा कर उसे तुरंत जेल भेज दिया जाएगा।

तब क्या होगा गठबंधन का?

नीतीश वास्तव में ऐसा करने की हिम्मत दिखाते हैं तो निश्चित रूप से यह लालू यादव से सीधा पंगा लेना होगा। जिनकी पार्टी आरजेडी व उनकी पार्टी जेडीयू का गठबंधन है। सरकार में ज्यादा विधायक अर्थात बहुमत लालू की पार्टी का ही है। मतलब साफ है कि आने वाले दिन बिहार में अभी से भी ज्यादा उथल-पुथल वाले हो सकते हैं। अभी नीतीश के फैसले का इंतजार है। मगर वो चाहे जो फैसला करें, उनकी इससे जो छवि बिगड़ी है वह अभी कुछ समय तक तो लोगों को नाराज करती ही रहेगी। बाकी ये तो भारतीय मतदाता है। बेचारा जल्दी ही सबकुछ भूल जाता है। दूसरा और कोई विकल्प जो नजर नहीं आता।