सबने पागल कहा, मगर डॉ. हाड़ा ने जिद नहीं छोड़ी और कर दिया कमाल

रबी के सीजन में 25 बीघा में पैदा की मक्का की शानदार फसल, बीज कम्पनी तक ने भी किया था मना, मगर नहीं माने, वही कम्पनी करेगी सम्मानित

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न्यूज चक्र @ बूंदी
डॉ. नरेन्द्र सिंह हाड़ा यूं तो प्रशिक्षित होम्यौपेथी चिकित्सक हैं। मगर सालों से प्रैक्टिस छोड़ रखी है। हमेशा से जुनून रहा है लीक से अलग कुछ करने का। और इसी जिद ने आखिर उन्हें कृषि के क्षेत्र मेंं अलग पहचान दिला दी। उन्होंने अपने फार्म की पच्चीस बीघा से अधिक जमीन पर गर्मी के मौसम (रबी सीजन) में मक्का जो उगा दी। वो भी शानदार। आमतौर पर इसे खरीफ सीजन की फसल माना जाता है।
शहर से पांच-छह किलोमीटर दूर दौलाड़ा ग्राम पंचायत के बालापुरा गांव में डॉ. हाड़ा के परिवार का खेत है। वर्षों से वह ही इसे सम्भालते आ रहे हैं। करीब आठ साल पहले किसी बीज कम्पनी ने उनके खेत की एक बीघा जमीन पर गर्मी के मौसम में मक्का का डेमा किया था। अर्थात प्रायोगिक तौर पर मक्का की बुवाई की थी। यही बात उनके दिमाग में थी। वह तभी से अपने खेत के बड़े हिस्से पर इस मौसम में अपने स्तर पर ही मक्का की फसल करने की सोच रहे थे। मगर उन्हें हाईब्रीड बीज नहीं मिल पा रहा था। इस बार तो उन्होंने यह ख्वाहिश पूरा करने की ठान ही ली | मक्का का बीज खरीदने गए। वहां इसे रबी सीजन में उगाने की बात कही। इस पर बीज कम्पनी के अधिकारी तक ने उन्हें यह रिस्क नहीं लेने की सलाह दी। मगर डॉ. हाड़ा ने 5 जनवरी को अपने खेत में मक्का के बीज रौप दिए।

पिता ने तो बोलचाल ही बंद कर दी थी, पत्नी भी थीं नाराज

जब वे ऐसा कर रहे थे तब गांव वालों ने उन्हें इसके लिए बहुत मना किया। डॉ. हाड़ा बताते हैं कई तो उनके मुंह पर ही कहने लगे थे कि, दिमाग फिर गया है। कुछ तो पागल तक कहने लगे। पिता देवेन्द्र सिंह तो इतने नाराज हुए कि बेमौसम मक्का बोने की प्लानिंग जाकर ही उनसे बात तक करना बंद कर दिया था। पत्नी सहित परिवार के अन्य सभी लोग भी उनके इस निर्णय के खिलाफ थे। मगर अब जब परिणाम सामने आया तो सब खुश हैं।

एक पौधे पर तीन से चार भुट्टे

डॉ. हाड़ा ने बताया कि किसी भी पौधे में दो से कम भुट्टे नहीं हैं। कई पर तो तीन से चार तक भुट्टे उगे हैं। फसल पूरी तरह स्वस्थ है।

ऑर्गेनिक खाद का अधिक उपयोग

डॉ. हाड़ा ने यह भी बताया कि इस फसल को उगाने में साठ प्रतिशत से अधिक ऑर्गेनिक अर्थात जैविक खाद का प्रयोग किया गया है। बहुत अधिक आवश्यकता होने पर ही रासायनिक खाद का उपयोग किया था।

गेहूं से अधिक बैठेगा उत्पादन

डॉ. हाड़ा का कहना है कि वे परम्परा के अनुसार इस सीजन में अगर गेहूं ही उगाते तो प्रति बीघा करीब आठ क्विंटल की पैदावार होती। मगर यह मक्का 12 से 15 क्विंटल प्रति बीघा बैठेगी। उस पर भी खास बात यह है कि गेहूं व मक्का के दाम लगभग बराबर हैं। इस प्रकार यह अधिक मुनाफे की फसल रहेगी। बेमौसम पैदा हुई मक्का की डिमांड भी अधिक रहेगी। इसके भुट्टे काफी स्वादिष्ट हैं। यह मक्का पीले रंग की ही है।

बीज कम्पनी करेगी सम्मानित

मना करने के बावजूद भी जोखिम लेकर मक्का उगाने वाले डॉ. हाड़ा को 4 मई को को संबंधित बीज कम्पनी सम्मानित करेगी। इसके लिए गांव में विशेष किसान शिविर आयोजित किया जा रहा है।

इनोवेटिव आइडिया है

डॉ. हाड़ा ने वास्तव में रिस्क लेकर यह काम किया है। यह उनका इनोवेटिव आइडिया था। बेमौसम मक्का उगाने से पहले उन्होंने हमसे सलाह ली थी। हम इस तरह के नए प्रयोग करने वाले किसानों को प्रोत्साहित करते हैं। मगर उन्हें सीमित क्षेत्र में ही यह प्रयोग करने की सलाह दी गई थी। फिर भी उन्होंने बड़े एरिया में इस सीजन में यह फसल सफल तरीके से पैदा कर कमाल कर दिया।
-डॉ. एनएल मीणा, प्रभारी कृषि विज्ञान केन्द्र, बूंदी