नजरिया: देश को कौनसी सीख देना चाहता है ये मीडिया?

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  • एक बड़ी खबर थी-कांग्रेस के बड़े नेता शशि थरूर भी राहुल गांधी, आनंद शर्मा, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल जैसे नेताओं की कतार में ही नहीं आए, बल्कि इनसे भी बाजी मार लेने की कोशिश की। कन्हैया की तुलना भगतसिंह से कर डाली। अब यह अलग बात है कि आज भगतसिंह होते तो इस पर क्या कहते या उनकी आत्मा कितना रो रही होगी? इससे भी बड़ी बात यह है कि थरूर ने यह बात बड़े ही बचकाना तरीके से कही। कन्हैया के समर्थकों की डिमांड पर ही इतनी बड़ी बात कह गए वह। और फिर थरूर के फरमाइश पूरी करने पर कन्हैया के समर्थक  खुश होकर बेहूदगी से हंसे तो उसमें उन्होंने भी वैसा ही साथ दिया। ऐसा लगा जैसे थरूर किसी कॉमेडी प्रोग्राम में शिरकत कर रहे हों। लेकिन इस मुद्दे पर कॉमेडी भी तो नहीं की जा सकती है ना। इसलिए बहुत दुख हुआ यह देख कर।
    एक और खबर खास रही। या यूं कहा जाए कि खबर तो खास नहीं थी, लेकिन मीडिया ने बना डाला। वह यह कि वैंकेया नायडू ने पीएम नरेन्द्र मोदी को देश के लिए भगवान का वरदान बताया। अन्य भाजपा नेताओं ने भी पीएम की अलग-अलग शब्दों में ऐसी ही तारीफ की। अब इन दोनों घटनाओं के बीच आता है मीडिया के रेस्पॉंस का मामला। अधिकतर मीडिया को शशि थरूर का कन्हैया की तुलना भगतसिंह से करना नहीं चुभा। इसे तो सिर्फ सामान्य खबर के रूप में पेश किया। मगर मोदी की तारीफों के मुद्दे पर तो न्यूज चैनलों ने बहस ही करा डाली। ऐसा लगा जैसे मोदी की तारीफ करना बहुत बड़ा जुर्म हो गया, देश को यह बताया जाए। मगर शशि थरूर के बयान को देश के लिए बिलकुल भी हानिकारक नहीं माना।
    फिर एबीपी न्यूज चैनल ने एक और बहस का आयोजन किया। बीजेपी के लिए राष्ट्रवाद प्रमुख या विकास। समझ नहीं आया इतना बड़ा चैनल राष्ट्रवाद व विकास को अलग-अलग करके कैसे देख रहा है? ये कैसी पत्रकारिता है, कैसी समझ है?