सच्चे मीडियाकर्मियों के लिए राहत है सुप्रीम कोर्ट का फैसला, आमजन भी जाने बड़े अखबारों की हकीकत

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न्यूज चक्र @ दिल्ली / सेन्ट्रल डेस्क

मजीठिया वेज बोर्ड के मसले पर 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई बहुप्रतीक्षित सुनवाई के बाद फैसले को लेकर लगाई जा रही अटकलबाजियों पर दो दिन बाद विराम लगता नजर आ रहा है। पहले अपुष्ट सूत्रों से मालूम पड़ा फैसला अखबार मालिकों की प्रताड़ना का शिकार हुए मीडियाकर्मियों के पूरी तरह खिलाफ माना जा रहा था। मगर अब आई जानकारी इसके पूरी तरह से उलट है।
इसके अनुसार 5 जुलाई तक लेबर कमिश्नर अखबार मालिकों की ओर से देश की सर्वोच्च अदालत को अपडेट से अवगत करवाएंगे। इसमें यह बताएंगे कि प्रताड़ना के लिए किए गए पत्रकारों के ट्रांसफर, टर्मिनेशन, डेप्युटेशन आदि निरस्त करने सहित एरियर का निस्तारण कर दिया या नहीं? 19 जुलाई से इस पर अंतिम सुनवाई शुरू होगी। दोषी पाए जाने वाले अखबार मालिकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अवमानना की कार्यवाही शुरू करेगा। गौरतलब यह है कि आगे की कार्रवाई श्रम विभाग के स्तर पर ही सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के तहत होगी। विस्तृत जानकारी के लिए फैसले की कॉपी का इंतजार है।

आम पाठक नहीं जानता अधिकतर बड़े अखबारों की हकीकत

बड़ी हंसी भी आती है अधिकतर बड़े अखबारों की चोंचलेबाजी पर। ये मौका-बेमौका विभिन्न प्रकार में समाजसेवी कार्य करने की नौटंकी करते नजर आते हैं। इनमें सर्दी के मौसम में गर्म कपड़े बांटना, अस्पतालों में फल-बिस्कुट आदि बांटना शामिल होता है। मगर क्या कभी किसी अखबार मालिक ने खुद की ओर से खरीदे नए कपड़े बांटे हैं? ये अखबार अपने पाठकों के द्बारा दिए गए पुराने कपड़े ही बांट कर समाजसेवी बन जाते हैं। इसी प्रकार मरीजों को बांटते हैं सबसे सस्ता फल केला और पांच-पांच रुपए के बिस्कुट के पैकेट। क्या कभी किसी ने इन्हें सेब मतलब एपल भी बांटते देखा है? वर्ष 2011 से पत्रकारों के वेतन के लिए मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू हो चुकी हैं। मगर अधिकतर अखबार मालिक इसका पचास प्रतिशत वेतन भी अपने पत्रकारों को नहीं दे रहे हैं। जबकि दिन-रात इनके लिए मेहनत करने वाले इन पत्रकारों की बदौलत ही आज ये एक-दो पन्नों के ब्लैक एंड व्हाइट अखबार से बारह-सोलह-अट्ठारह पेज के अखबारों तक पहुंचे हैं।
यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि अधिकतर वो पत्रकार जो विभिन्न घोटाले कर सम्पन्न बने हैं या जिन्हे अपनी अयोग्यता के कारण कमाई का और कोई जरिया दिखाई नहीं देता है…..वे ही इनसे हर कंडिशन पर जुड़े रहने को मजबूर हैं।