हिन्दुत्व ही है भारत की आत्मा: नंदलाल

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राष्ट्र चेतना अभियान समिति की प्रबुद्ध जन संगोष्ठी

विश्व के कल्याण का विचार ही साम्प्रदायिक कहा जाने लगा
न्यूज चक्र @ कोटा

हिन्दुत्व की परम्परा से ही विश्व में शांति संभव है। यही भारत की आत्मा है। हिन्दुत्व में ही विश्व के कल्याण का विचार है। विडम्बना है कि आज इसी को साम्प्रदायिक, संकीर्ण और असहिष्णु कहा जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजस्थान क्षेत्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं वरिष्ठ प्रचारक नन्दलाल ने यह बात कही। वे मंगलवार को वर्तमान परिदृश्य में राष्ट्रहित विषय पर आयोजित प्रबुद्धजनों की संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थ्ो। यह आयोजन रावतभाटा रोड स्थित मानव विकास भवन में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कोटा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. परमेन्द्र कुमार दाशोरा ने की। मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र निर्मोही व समिति के विभाग संयोजक त्रिलोकचन्द्र जैन थे।

नंदलाल ने इस अवसर पर आगे कहा कि विश्व के कल्याण का उदात्त चिंतन भारत से ही निकला है। जब देश गुलाम हुआ तो राष्ट्रीय दृष्टिकोण समाप्त हो गया। उस दौरान तथाकथित विद्बानों ने भारत की सनातन धारा को विस्मृत करना शुरू कर दिया। वे वसुधैव कुटुम्बकम् और कृण्वन्तो विवमार्यम् जैसे विचारों को भी बकवास कहने लगे। दूसरी ओर पूरे विश्व में भारतीय जीवन पद्धति को स्वीकार किया जा रहा है। जो लोग कल तक मोमबत्तियां जलाते थे, वे ही आज दिवाली के रूप में दीये जला रहे हैं। भारत की सहिष्णुता के कारण ही केरल में देश की प्रथम मस्जिद एक हिन्दू राजा ने बनवाई। ईरान से मारकर और पीटकर भगाए गए पारसी समुदाय का भारतीयों ने हृदय से स्वागत किया। वे आज हिन्दुओं के साथ घुलमिल गए हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेकानेक विश्वविद्यालयों में गीता को विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने गीता का अध्ययन करते हुए इसे भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का पक्ष लिया था। उन्होंने कहा था कि गीता में भारत का तत्वज्ञान मौजूद है। हमारे देश में गीता को किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाने या फिर राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का प्रस्ताव भी कोई दे दे तो वह साम्प्रदायिक हो जाता है। हिन्दुत्व का चिंतन ही विश्व में शांति का आधार बन सकता है। विश्व की वैचारिक पृष्ठभुमि में भी हिन्दुत्व की धारा से ही शांति संभव है। वैचारिक परिदृश्य मंे यही लगता है कि भारत को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा।

अध्यक्षता कर रहे प्रो. दाशोरा ने कहा कि विश्व भर में आतंक फैल रहा है। मानवता को आश्रय केवल भारतीय चिंतन से ही मिल सकता है। हमें कमजोर करने वाली ताकतों का एकजुट होकर मुकाबला करना होगा। आज विश्ोष विचार से प्रभावित लोग अपने स्वार्थ के लिए असहिष्णुता की बात करते हैं। यह पूरी तरह से नियोजित कार्यक्रम है। हम ऐसी शक्तियों को अपनी सनातन परपरा से परास्त करेंगे और भारत की मनीषा को जागृत करेंगे। मुख्य अतिथि जितेन्द्र निर्मोही ने कहा कि आज वैचारिक स्तर इतना निम्न हो गया है कि हमारी सनातन परंपरा को हिन्दू पद्घति कहने में लोग संकीर्णता महसूस करने लगे हैं। मार्क्सवादी चिंतन से प्रभावित लोगों के द्बारा मार्क्सवादी लोगों को पुरस्कार दिए जाते रहे हैं, आज वे लौटाने का नाटक भी उन्हीं लोगों के कहने पर कर रहे हैं। महानगर संयोजक महेश शर्मा ने आभार जताया। कार्यक्रम में पत्रकार, साहित्यकार, लेखक एवं शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद थे।