आत्महत्याओं पर जब हुआ भारी बवाल और पड़ा दबाव, तब जाकर जगी सरकार

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coaching student Shakshi, who hanged herself on Friday

कोटा में कोचिंग स्टूडेंट्स की आत्महत्याओं का मामला

सरकार ने 10 दिसम्बर को बुलाया संबंधित अधिकारियों को

न्यूज चक्र @ जयपुर

कोटा में लगातार हो रही कोचिंग स्टूडेट्स की आत्महत्याओं से पैदा हो रहे बवाल व दबाव का असर अब जाकर राज्य सरकार पर हुआ है। इसके चलते वहां के सभी संबंधित अधिकारियों को 10 दिसम्बर को जयपुर बुलाया गया है। इनके साथ कोचिंग संचालकों को भी बुलाए जाने की बात सामने आ रही है। मुख्य सचिव सीएस राजन इनकी बैठक लेंगे। संभावना है कि समस्या के हल के लिए दोनों पक्षों के बीच बातचीत होकर कोई रोडमेप तैयार किया जाएगा।

इतने गंभीर हालात, फिर भी सरकार अभी तक क्यों रही मौन?

उल्लेखनीय है कि कोटा में लगातार दो दिन में दो कोचिंग स्टूडेंट्स आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें एक छात्रा भी शामिल है। छह माह में 10 व खत्म हो रहे इस चालू वर्ष में अभी तक 27 स्टूडेंट्स खुदकशी कर चुके हैं। पांच साल में यह आंकड़ा 75 पहुंच गया है। माना जा रहा है कि कोचिंग संस्थानों से हर पक्ष को किसी न किसी प्रकार से होने वाले आर्थिक फायदे के चलते वे रुतबेदार कोचिंग संस्थानों के खिलाफ मुंह खोलने से कतराते रहे हैं।

कोटा में यह है खास बात

कोटा ने पिछले कुछ सालों के भीतर ही देश के सबसे बड़े कोचिंग हब के रूप में अपनी पहचान व साख बना ली है। देश के हर कोने से स्टूडेंट्स यहां डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना पाले आते हैं। यहां के कोचिंग सेंट्र्स में एडमिशन मिलने को ही स्टूडेंट्स बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं। इनकी साख व पिछले रिकॉर्ड के चलते स्टूडेंट्स को लगता है कि प्रवेश मिल गया तो आधी सफलता मिल गई।

परेशानी यहां आती है

मगर दिक्कत तब पैदा होती है जब कोचिंग संस्थान अपने स्टूडेंट्स की सफलता के आंकडों को बेहतर रखने के लिए उन पर हर संभव दबाव बनाते हैं। जो स्टूडेंट्स कमजोर परफोर्मेंस करते नजर आते हैं, उनकी उपेक्षा शुरू हो जाती है। इससे उनमें या तो हीन भावना आ जाती है, अवसाद घर कर जाता है या फिर पढ़ाई का बहुत ज्यादा दबाव बन जाता है। इन सबसे वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। स्वभाविक रूप से सफल होने वाले स्टूडेंट्स का आंकड़ा काफी कम होता है। इनसे कई गुना स्टूडेंट्स असफल हो जाते हैं। जिन स्टूडेंट्स को अपनी परफोर्मेंस कमजोर लगने लगती है, वे वहीं से डिप्रेशन का शिकार हो चुके होते हैं। उन्हें लगने लगता है कि अब उनके लिए जीवन के कोई मायने नहीं रह गए हैं। अधिकतर बालक-बालिकाएं अपने माता-पिता की आकांक्षाओं के कारण ही यहां कोचिंग करने आती हैं। ऐसे में वे खुद को उनका सामना करने के लायक भी नहीं मानते हैं।
माना गया है कि कोटा में कोचिंग करने वाले 70 फीसदी स्टूडेंट्स डिप्रेशन का शिकार हैं। जानकारों के अनुसार हर साल कोचिंग करने आने वाले लाखों स्टूडेंट्स मंे से तीन-चार हजार छात्रों को ही सफलता मिलती है।
कोचिंग संस्थानों को सिर्फ पैसों और अपनी साख से मतलब
हालात को और भी अधिक यहां के कोचिंग संस्थानों का रवैया बिगाड़ रहा है। उन्हें सिर्फ फीस से मतलब होता है या फिर टेलंेटेड स्टूडेंट्स से। क्योंकि टेलेंटेड स्टूडेंट ही सफल होकर उनकी साख बढ़ाने वाले होते हैं। वे कमजोर स्टूडेंट्स की तो ख्ौर-खबर भी मात्र फीस लेने तक ही लेते हैं।