दूसरे दिन फिर दहल गई कोचिंग सिटी, अब छात्रा ने की आत्महत्या

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न्यूज चक्र @ कोटा

देश की प्रसिद्ध कोचिंग सिटी में लगातार दूसरे दिन शुक्रवार को एक और कोचिंग स्टूडेंट ने आत्महत्या कर सभी को दहला दिया है। साथ ही पूरी व्यवस्था पर गंभीर खड़े होते सवाल और भी ज्वलंत बन गए हैं। आंकड़ों में जाएं तो छह माह के भीतर ही इस तरह की आत्महत्याओं का आंकड़ा एक दर्जन तक पहुंच गया है। वहीं एक साल में यह संख्या 26 हो गर्इ है। आज बिहार की निवासी शताक्षी गुप्ता ने अपने कमरे में चुन्नी से लटक कर जान दे दी। वह यहां के रेजोन्ोंस कोचिंग इंस्टीट्यूट से आईआईटी की कोचिंग कर रही थी। वहीं गुरुवार सुबह लुधियाना के वरुण का शव इसी प्रकार उसके कमरे में पंख्ो पर फंदे से झूलता मिला था। वह एलेन कोचिंग इंस्टीट्यूट से प्री मेडिकल की तैयारी कर रहा था। यहां खास बात यह भी है कि आत्महत्या के अधिक मामले एलन और रेजोनंेस से कोचिंग करने वाले स्टूडेट्स के ही सामने आए हैं।
शताक्षी यहां आईएल टाउनशिप में रहने वाले अपने मौसा-मौसी के पास रह रही थी। उसके मौसा यहां आईएल में कार्यरत हैं। उसके माता-पिता गाजियाबाद, यूपी में रहते हैं। पिता वहीं सर्विस करते हैं। शताक्षी ने अपने कमरे में चुन्नी से फंदा लगाकर आत्महत्या की। फिलहाल पुलिस को उसका कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। उसके माता-पिता को घटना की सूचना देकर शव को एमबीएस अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया है।

जनप्रतिनिधि, सरकार, पुलिस व प्रशासन क्यों नहीं सख्त

भारी भरकम फीस वसूलने के बावजूद स्टूडेंट्स की परेशानियों से पूरी तरह उदासीन रहने वाले कोचिंग संस्थानों पर हर एक स्टूडेंट की आत्महत्या सवाल खड़े करती रही है। इनमें से कई स्टूडेंट्स के सुसाइड नोट में तो बाकायदा अपने कोचिंग सेंटर की खामियों को गिनाया गया है। कोचिंग सेंटरों का सरोकार मात्र फीस से ही है, यह गुरुवार को वरुण की आत्महत्या से भी साबित हो गया है। उसकी आत्महत्या के बाद ही एलन कोचिंग इंस्टीट्यूट ने खुलासा किया कि वरुण ने पांच महीने में सिर्फ सात बार ही इंस्टीट्यूट अटेंड किया था। मगर इंस्टीट्यूट ने उसके माता-पिता को इतनी गंभीर स्थिति तक से अवगत नहीं कराया। जबकि किसी स्टूडेंट की फीस थोड़ी भी लेट हो जाए तो वे तुरंत उसके अभिभावक से सम्पर्क करते हैं। ऐसे हालातों के बावजूद इन इंस्टीट्यूट के खिलाफ कोई दमदार आवाज नहीं उठने या सख्त नियम नहीं बनने के पीछे इनके दमखम को कारण माना जाता है। यहां आमधारणा है कि कोई सी भी राजनीतिक पार्टी या जनप्रतिनिधि हो, सभी को ये मोटा चंदा देते हैं। प्रशासनिक कार्यक्रमों के लिए भी ये समय-समय पर छोटी-मोटी मदद कर प्रशासन का मुंह बंद रखते हैं।