नजरिया: किस कारण शाहरुख व आमिर को भारत लगने लगा असहिष्णु ?

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राजीव सक्सेना

शाहरुख ने जब देश में असहिष्णुता बढ़ने की बात कही थी तो मुझे दुख हुआ था, मगर आश्चर्य नहीं। क्योंकि मैंने कभी भी शाहरुख को बुद्धिजीवियों की श्रेणी में नहीं रखा। वे मुझे हमेशा उनकी बॉडी लैग्वेज से छिछोरे इंसान लगे हैं। इसमें उनके हंसने की स्टाइल भी शामिल है। और अब जबकि वे 5० के हो चुके हैं, उस समय भी सार्वजनिक स्थानों, मंचों आदि पर ऐसी हरकतें व भाव-भंगिमाएं करते हैं….. जैसे वे टीनएजर हों। यह उनके प्रौढ़ाते चेहरे, छाती जा रही झुर्रियों से मैच तो करती ही नहीं हैं, उलटे उन्हें अजीब बनाती हैं। सबसे अधिक कोफ्त तो उस समय हुई थी, और उनके संस्कार झलके थ्ो, जब वे बेवजह विश्वभर के लिए आदरणीय अमिताभ बच्चन जैसे इंसान तक के लिए ऊलूलजुलूल बोलते रहते थ्ो। इसके बावजूद भी कि जब पत्रकार शाहरुख की टिप्पणियों पर अमिताभ से प्रतिक्रिया मांगते थ्ो तो वे यही कहते थ्ो कि वे (शाहरुख)बड़े आदमी हैं। जैसा उन्हें अच्छा लग रहा है, वे कह रहे हैं। यह अलग बात है कि आखिर में अमिताभ की नम्रता, सौम्यता और संस्कारों के आगे शाहरुख को झुकना ही पड़ा। शाहरुख के व्यक्तित्व का इससे भी खुलासा होता है कि वे अक्सर यह कहते सुने गए हैं कि पैसा ही उनके लिए बड़ी चीज है। यह उनके कहने से ही नहीं, उनके कृतित्व से भी साफ हो जाता है। इसलिए शाहरुख ने जब देश में असहिष्णुता मानी तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था।
मगर आमिर खान के साथ ऐसा नहीं था। उनकी कार्यश्ौली उन्हेंं इस लीक से अलग करती थी। इस पर सत्यमेव जयते जैसी रचना करके उन्होंने देशवासियों के दिलों में और भी जगह बना ली थी। वे बुद्धिजीवियों की श्रेणी में आ गए थ्ो। मगर जब उन्होंने पत्नी की आड़ लेकर देश के माहौल पर सवाल उठाए तो, सचमुच धक्का लगा। प्रश्न तो है ही इन दोनों कलाकारों से कि मुम्बई बम विस्फोटों, आतंकी हमलों, गोधरा में फूंकी गई ट्रेन, मुज्जफरपुर के दंगों आदि के समय क्या उन्हें देश का माहौल सही लगा था। जब दर्जनों ही नहीं सैकड़ों निरपराध लोगों की जान गई थी, तब तो यह देश रहने लायक था, मगर अब इक्का-दुक्का घटनाओं पर ही इन्हें देश असहिष्णु लग रहा है। उस पर भी वह देश…… जिसके करोड़ों लोगों ( बहुसंख्यक हिन्दुओं) की बदौलत ही दुनिया में उन्हें पहचान मिली ही नहीं, पहचान है। वरना अच्छा अभिनय करना क्या देश के लिए कोई उपलब्धि है? इससे देश को…..देशवासियों को कोई लाभ तो नहीं है ना? फिर देशवासी उनके पीछे दीवाना क्यों हैं? आज उन्हीं की मंशा पर, उन्हीं की भावनाओं पर ये दोनों सवाल उठा रहे हैं तो वास्तव में ये देश पर सवाल उठा रहे हैं। उनके यह विचार… उनके करोड़ों प्रशंसकों का अपमान नहीं है क्या? उनके लटकों-झटकों, नाचने, झूमने, चलने के अंदाज पर फिदा होने वाले लोगों का अपमान नहीं है क्या? क्या इनके प्रशंसक नहीं जानते कि ये दोनों मुस्लिम धर्म के अनुयायी हैं, इसके बावजूद भी क्या कभी किसी ने उनसे इस नजरिये से बर्ताव किया? शाहरुख तो खुद अपने आपको अक्सर छोटी हरकतों व बचकानी बातों से विवादों में रखते आए हैं, इसके बावजूद भी क्या कभी उनके साथ कोई ऐसा बर्ताव हुआ, जो उन्हें यह महसूस कराए कि वे एक आम हिन्दुस्तानी नहीं बल्कि मुस्लिम हैं?
सवाल तो यहां बहुत गहरे हो रहे हैं…..वो इसलिए कि कुछ महीनों पहले नसीरुद्दीन जैसा शख्स पाकिस्तान में जाकर भारत की तगड़ी बुराई कर आता है। उन्हें भी नसीरुद्दीन शाह के रूप में पहचान तो यहां के करोड़ों लोगों ने ही दी है ना। एक और हैं रजा मुराद जो खलनायक की भूमिकाओं में काफी पहचाने जाते हैं, उन्हंे भी भारत असहिष्णु लग रहा है। जहां के करोड़ों लोगों की पसंद के कारण ही वे पर्दे पर चमकते हैं। फिर कहूंगा सवाल बहुत गहरा है……अचानक ऐसा क्यों? अब तो यह भी कहूंगा कि राज भी बहुत गहरा लग रहा है……जांच का विषय है कि असहिष्णुता वास्तव में आ कहां रही है…..भारत में तो नहीं दिखती है। जिनके दिलों को यह लग रहा है, उन्ही के जांच की जरूरत है।
ताज्जुब हो रहा है कि जिन देशवासियों की बदौलत ये लोग अरबों की दौलत से ख्ोल रहे हैं, ये उसी देश को विश्व पटल पर बदनाम करने पर कैसे तुले हुए हैं।

कहीं यह कारण तो नहीं?

लाख कोशिशों के बावजूद आमिर व शाहरुख की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सलमान खान की फिल्मों की तरह बिजनेस नहीं कर पाती हैं। ये दोनों हर तरह की मशक्कत के बावजूद सलमान खान जैसा स्टेटस नहीं पा सक रहे हैं। कहीं इसलिए तो ये दोनों कलाकार देशवासियों पर अपनी खीझ नहीं निकाल रहे?

आमजन से जिनका जुड़ाव नहीं, वे ही उठा रहे हैं देश के माहौल पर सवाल

देश में माहौल बिगड़ने की बात करने वाला कोई भी व्यक्ति आमजन से जुड़ाव नहीं रखता है। ये सब वो लोग हैं, जो सारा फीडबैक अखबारों व न्यूज चैनलों से लेते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि देश में कहीं भी निकल जाएं, कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो हिन्दु-मुस्लिम या अन्य मजहब के लोग सामान्य दिनों की तरह ही आपस में भाईचारे से रहते, मिलते-जुलते, खाते-पीते, हंसी-मजाक करते, एक-दूसरे के घर आते-जाते, साथ मिलकर त्योहार मनाते, अन्य हंसी-खुशी के पलों को ही नहीं दुखों को भी बांटते मिल और दिख जाएंगे।