तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा……..

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    अवाम के शायर साहिर लुधियानवी को पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि

    न्यूज चक्र @ सेन्ट्रल डेस्क

    तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको, मेरी बात और है, मैंने तो मोहब्बत की है…दीदी फिल्म का यह गाना यों तो मुकेश ने भी दिल से गाया था, लेकिन सुधा मल्होत्रा ने तो इसकी रूह में घुस कर गाया था। यही नहीं खास इसे कम्पोज भी किया। उतनी ही शिद्दत से साहिर ने इसे लिखा भी था। सुधा को ये गीत बेहद पसंद था, दिल की अथाह गहराइयों तक। बताया जाता है कि सुधा उतनी ही शिद्दत से साहिर को चाहती थीं, जितना कि अमृता प्रीतम को साहिर। ये बात और थी कि साहिर ने सिर्फ और सिर्फ अमृता को ही चाहा। यही वजह है कि साहिर के नगमों में रूमानियत के भरपूर दीदार होते हैं। मजबूरियां कुछ ऐसी थीं कि साहिर न अमृता से शादी कर पाए और न ही सुधा से। साहिर ने किसी और से भी शादी नहीं की। और अमृता ने भी नहीं। वो सिर्फ और सिर्फ मां के लिए जीते रहे।
    साहिर में लुधियाना एक मुस्लिम गुज्जर परिवार में जन्मे थे। बचपन बेहद अजीबो-गरीब और संगीन हालात में गुजरा। माता-पिता की पटरी आपस में कतई नहीं बैठती थी। बाप ने दूसरी शादी कर ली। वो बहुत जालिम था। साहिर की मां को पूरी तरह से बरबाद करने पर अमादा था, चाहे इसमें साहिर की जान ही क्यों न चली जाए। साहिर की मां पूरी शिद्दत से अपने हकूक और साहिर के हक और हिफाजत के लिए लड़ती रही। यही वजह है कि साहिर ने ताउम्र जुल्म की मुखालफत की।
    साहिर की तालीम और तरबीयत लुधियाना में ही हुई थी। 1947 में साहिर लाहोर चले गए। मगर अपने इंकलाबी मिजाज और शायरी की वजह से पाकिस्तान की सरकार उनको शक की निगाह के देखने लगी। फिर उन्हें पाकिस्तान का इस्लामिक माहौल भी पसंद नहीं था। उन्हें अपने हिदू-सिख दोस्तों की सोहबत बेहद याद आती थी। 1949 में वो आजाद ख्याल भारत आ गए। कुछ वक़्त दिल्ली में गुजारा। फिर बम्बई आ गए। सिर्फ शायरी से पेट नहीं भरता। लिहाजा फिल्मों की तरफ रुख किया।
    साहिर को 1949 में ही पहली फिल्म मिली ‘आजादी की राह’। मगर बदकिस्मती से न तो फिल्म को और न ही साहिर को तवज्जो मिली। पहली कामयाबी नौजवान (1951) में मिली। इसका यह गाना तो बेहद कामयाब हुआ- ये ठंडी हवाएं, लहरा के आए्र…संगीत सचिन देव बर्मन का था। सचिन दा और साहिर की जोड़ी हिट हो गई। उसी साल गुरुदत्त की ‘बाजी’ में फिर साथ रहा उनका। लेकिन ‘प्यासा’ में इसका दुखद अंत हो गया। दरअसल इस फिल्म की .कामयाबी में ज्यादा जिक्र साहिर के नग्मों का हुआ। साहिर इस पर खुले आम बोले भी। सचिन दा को यह अच्छा नहीं लगा।
    साहिर की शर्त होती थी कि उन्हें हर गीत का पारिश्रमिक लता मंगेशकर के मुकाबले एक रुपया ज्यादा मिले। जिन्होंने साहिर को बहुत करीब से देखा है वो जानते थे कि ‘प्यासा’ में गुरुदत्त ने विजय नाम के जिस किरदार को जीया, वो दरअसल साहिर के भीतर का शायर ही था।
    ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के,
    ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के,
    कहां हैं, कहां हैं मुहाफिज खुदी के?
    जिन्हे नाज है हिद पे वो कहां हैं?
    इस गाने ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को भी हिला दिया था।
    ताजमहल के बारे में साहिर के ख्यालात दुनिया के बिलकुल उलट थे। दरअसल वो फकीरों के मसीहा थे। मुफलिसी को उन्होंने बेहद करीब से देखा था। रूमानियत में भी उनके इस ख्यालात का दीदार हुआ। तभी तो उन्होंने लिखा था- इक शहनशाह ने दौलत के सहारा लेकर, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक।
    अब यह बात दीगर है कि ‘ताजमहल’ के बेहतरीन गानों के लिए ही साहिर को बेस्ट गीतकार के फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया था। पांव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी….जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा….जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं…। साहिर इनामों के मोहताज कभी नहीं रहे। अवाम ने उन्हें सराहा, यही उनका सबसे बड़ा इनाम था।
    साहिर सिर्फ नज्मों और गजलों में ही नहीं, जमीनी सतह पर जुल्म और हक के लिए भी लड़ते रहे। इसकी तमाम मिसालें मौजूद हैं। हक के लिए लड़ाई का ही यह नतीजा था कि ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित होने वाले गानों में गायक और संगीतकार के साथ गीतकार का नाम भी शामिल हुआ। नतीजतन गीतकार को भी रॉयल्टी मिलनी शुरू हुई।
    बीआर चोपड़ा परिवार से साहिर के संबंध ताउम्र रहे। उनके लिए एक से एक यादगार गाने लिखे। औरत ने जन्म दिया मरदों को…मैं जब भी अकेली होती हूं….न तू हिदू बनेगा न मुसलमान बनेगा…चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों…साथी हाथ बढ़ाना…नीले गगन के तले…ऐ मेरी जोहरा जबीं…
    यश चोपड़ा ने जब बीआर कैंप से अलग होकर अपना प्रोडक्शन हाउस बनाया तो उनकी भी पहली पसंद साहिर ही रहे। एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग…मेरे दिल में आज क्या है, तू कहे तो मैं बता दूं….मैं पल दो पल का शायर हूं…आदि इस कैंप के लिए लिख्ो।
    साहिर को सिपुर्द-ए-खाक हुए आज पूरे पैंतीस बरस बीत चुके हैं। यों तो इस अरसे में कई यादें मिट जाती हैं। लेकिन साहिर को भूलने के लिए सैकड़ों साल चाहिए। मोहब्बत और इंकलाब की एक साथ शिद्दत से हिमायत करने वाले को यूं भी भुलाया जाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
    मैंने साहिर को 1973 में देखा था। वे पहली नॉन-मुस्लिम उर्दू राइटर्स कॉन्फ्रेंस में शिरकत करने लखनऊ आए थे। उनकी मसरूफियात इतनी ज्यादा थी कि बात नहीं हो पाई। महज हाथ मिला पाया था। मगर इस बात का फख्र है कि मैंने साहिर को देखा ही नहीं, छुआ भी है। वो साथ में तीन पेटी वेट 69 लाए थे। उसमें से एक घूंट मारने को मौका भी मिला था।
    पंजाबियत के जज्बे से भरपूर साहिर लुधियानवी का योगदान उर्दू अदब के लिए बेमिसाल है। मगर फिल्मों में उनका जलवा भी उतना ही असरदार रहा। साहिर की नस-नस में मोहब्बत, विद्रोह और जोश लहू बन कर बहता रहा। कहते हैं साहिर ने फिल्म की कहानी या सिचुुएशन सुन कर गीत नहीं लिख्ो। उनके खजाने में बेशुमार गीत पहले से ही मौजूद होते थ्ो। फिल्मकार को उसकी जरूरत का ढेर सा सामान आसानी से मिल जाता था।
    साहिर असल मायनों में अवाम के शायर थ्ो। तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा….ओ मेरी जोहरा जबीं….साथी हाथ बढ़ाना….ये देश है बीर जवानों का….बाबुल की दुआएं लेती जा….हटा दो, हटा दो मेरे सामने से ये दुनिया….हमने तो जब कलियां मांगी….सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए….ये इश्क इश्क है इश्क इश्क….न तो कारवां की तलाश है….अल्लाह तेरा नाम, ईश्वर तेरो नाम….मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया…..संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे…..तोरा मन दरपन कहलाए….छू लेने दो नाजुक होंटों को….तुझे चांद के बहाने देखूं, के छत पर आ जा गौरिये….महफिल से उठ जाने वालों, तुम लोगों पर क्या इल्जाम….कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है….बड़ी लंबी फेहरिस्त है, जिसे यहां समेटना मुमकिन नहीं।
    अफसोस कि रूहानी मोहब्बत का सरपरस्त और जुल्म की मुखालफत करने वाला ये मसीहा महज 59 साल की उम्र में ही गुजर गया। मुझसे पहले कितने शायर आए और आकर चले गए, कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नगमे गाकर चले गए। महेन्द्र कपूर ने उनके लिए बिलकुल सही कहा था-मैं नहीं समझता कि साहिर जैसा शख्स दोबारा कभी पैदा होगा।
    साहिर का जन्म 8 मार्च 1929 को लुधियान में और इंतकाल 25 अक्टूबर 198० को मुम्बई में हार्ट अटैक से हुआ था।

    सआभार-वीर विनोद छाबड़ा